Tuesday, July 5, 2011

आखिर है क्या कोशी दियारा...

कोसी का कुछ क्षेत्र आखिर क्यों कहलाती है दियारा-




 आखिर कोसी दियारा का क्या है भूगौल-
कोसी दियारा क्षेत्र की अपनी अलग-थलग संस्कृति है. अंग प्रदेश के राजा टोडरमल ने लगान लागू करने के ख्याल से जब पूरे राज्य का सर्वे व पैमाईश किया तो इस दरमियान जब कोसी क्षेत्र की दुर्गम क्षेत्रों में प्रवेश किया तो काश-पटेर से सजी इस ईलाके की जमीनों का सर्वे व पैमाईश नहीं कर सके और थक-हार कर अन्य मुसीबतों से परहेज करते हुए अपने दस्तावेज में लिख दिया कि फर्क किया. यानि पैमाईश से अलग किया. जिस कारण राजा टोडरमल ने इस ईलाके को अपनी लगान सूची से फर्क कर दिया और उसी दिन से यह ईलाका फरकिया व दियारा क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा. बिट्रिश हुकूमत ने भी राजा टोडरमल के सर्वे व पैमाईश को हीं मान लोगों से लगान वसूली किया करते थे. उस वक्त कोसी नदी भी उनमुक्त थी. 


कोसी दियारा में दोहटवारी प्रथा-
सहरसा-खगड़िया सीमा क्षेत्र का कुछ हिस्सा हीं मूल रुप से कोसी का दियारा व फरकिया क्षेत्र कहलाता है. इस ईलाके में भागलपुर, बेगुसराय, मुंगेर, लखीसराय एवं मुजफ्फरपुर आदि जगहों के हीं किसान दलहन, तेलहन गरमा फसल की खेती करने के लिए हीं अपनी कामत इन ईलाकों में बना रखा था और ये जमींदार अपने से खेती नहीं बल्कि बटाईदारी पर खेती करवाते थे. जिसे कोसी व गंगा के इलाकों में दोहटवार के नाम से लोग जानते थे. क्षेत्र दुर्गम होने की वजह से दोहटपार भी कभी -कभार हीं अपनी जमीनों की ताकीद करने आया करते थे. जिस कारण धीरे-धीरे उक्त जमीनों पर बटाईदारों ने जबरदष्ती अपना कब्जा जमा लिया और बटार्ददारों से निबटने के लिए दोहटवार किसानों ने इस क्षेत्र के दबंगों का सहारा लिया. जो दबंग दोहटवार के लिए लठैती किया करते थे वह अब स्वंय के लिए काम करना षुरु कर दिया और दोहटवार एवं बटाईदारों के बीच के शोषण का हिस्सा बन गया.दोहटवारी प्रथा के कारण ही दियारा क्षेत्रों में आपराधिक ताकतों का न केवल पदार्पण हुआ बल्कि दुर्गम क्षेत्र होने के कारण नये-नये गिरोहों का शरण स्थली बन गया. जो आज आपराधिक इतिहास के रूप में कायम हो गया है. 
कोसी तटबंध के दियारा क्षेत्र का आपराधिक संघर्ष-
कोसी के इन दियारा क्षेत्रों में बटाईदारों एवं दोहटवारों के बीच का झगरा अब धीरे-धीरे दबंगों व बटाईदारों के बीच होने लगी और षरु हो गयी कोसी दियारा के अंदर भुमि संघर्ष. तब हर रोज होने लगी खूनी जंग. इस खूनी जंग ने कोसी के दियारा क्षेत्रों में कईयों को जन्म दिया तो कईयों को गले लगा लिया और कोसी क्षेत्र पूर्णरुप से अपराधियों की बांहों में झूमने लगा. इसके बाद ही दियारा क्षेत्रों में जातीय आधारित आपराधिक संघर्ष षुरु हो गयी.
-ःकोसी दियारा में आपराधिक गिरोह का जातीय गठन:-
इस ईलाके में कोसी तटबंध के अंदर पहले तो अपराधी पनपा फिर अपराधी गिरोह दो जातीय खेमों एक यादव व दुसरा तीयर (चैधरी) में बंट गया. पहले अपराधी-अपराधी एक होकर बटाईदारों को लूटा और अब बटाईदारों के हांथों फंसी दोहटवारों की जमीन पर कब्जा जमाने के लिए यादव व चैधरी अपराधिक गिरोहों के बीच हर रोज फसाद व खुनी जंग होते रहती है और इसी खूनी जंग में इस ईलाके में कुख्यात रामानंद यादव, इंगलिष चैधरी, रामपुकार यादव, रमेष यादव, जीतन यादव, सŸान चैधरी, छबिया यादव आदि का जन्म हुआ. इनमें रामानंद यादव को छोड़ छबिया यादव व सŸान चैधरी आदि पुलिस व एक दुसरे के हांथों मारे जा चुके हैं और जो बचें हैं उनके बीच खूनी जंग होते हीं रहती है. 
कोसी दियारा में माओवादी-
कोसी दियारा के ईलाके में जातीय संघर्ष से उब चुके गरीबों के बीच बचाने के लिए मसीहा बनकर माओवादी आ धमके. माओवादी कोसी नदी क्षेत्र के गरीबों के बीच पैठ बनाकर दोनों जातीय आधार पर खूनी जंग में षामिल आपराधिक गिरोहों जिनके षिकार गरीब हुआ करते थे के लिए संघर्ष करना षुरु कर दिया और 9 मई 09 को सहरसा जिले के सलखुआ थाना अन्तर्गत चिड़ैया ओपी के सरबजीता गांव के चिकनी टोला में धाबा बोलकर पहला हमला बोला. अब कोसी दियारा का संघर्ष माओवादियों के हांथों में चला गया और गरीब-गुरुवा रोज-रोज माओवादी एवं जातीय आधार पर तैयार आपराधिक गिरोहों की चक्की में पीसे जा रहे हैं.कोसी दियारा के ईलाकों से नक्सलियों के मुठभेड़ में पुलिस के जवान भी मारे गये और नक्सली सहित्य, वरदी आदि की बरामदगी भी हुई है.