Saturday, March 11, 2017

होली पर्व से जुड़ी पूर्णिया का ऐतिहासिक स्थल सिकलीगढ़ किला

होली पर्व से जुड़ी पूर्णिया का ऐतिहासिक स्थल सिकलीगढ़ किला

  • सिकलीगढ़ किला बनमनखी के धरहरा में है अवस्थित
  • हिरण्यकाश्यप का नरसिंग अवतार का खंभा अब भी यादों को रहा ताजा

क्षितिज कुमार/पूर्णिया 
देश में जहां जायें आपको चैक-चैराहांे पर मंदिर बना हुआ मिल जायेंगे। अगर पूर्णिया की ही बात करें तो यहाँ भी सैकड़ो की संख्या में मंदिर है। जिसमें एक ऐसा भी मंदिर है जिसका अपना एक ऐतिहासिक महत्व व तथ्य भी है। इतना ही नहीं हिन्दू धर्म के आस्था से भी जुड़ा हुआ है। जिसकी परवाह न पूर्णिया वासियों को है और न ही बिहार सरकार को। जी हाँ, हम बात कर रहे है बनमनखी प्रखंड के धरहरा स्थित सिकलीगढ़ किला का। जहाँ भगवान विष्णु ने नरसिंग अवतार लेकर हिरण्यकाश्यप का वध किया था। प्राचीन कथा के अनुसार होलिका के मरने के बाद होली त्यौहार की शुरुआत हुई थी। बनमनखी के धरहरा में आज भी वह खंभा मौजूद है। जिसे फाड़ कर नरसिंग भगवान ने अवतार लिया एवं हिरण्यकाश्यप का वध भी किया। आज यह जगह जीर्णशीर्ण अवस्था में पड़ा हुआ है। इस जगह को आज तक बिहार सरकार पर्यटन स्थल भी घोषित नहीं कर पायी है। हालांकि यह स्थल पहले से बेहतर जरूर हुआ है। इस क्षेत्र को लोग श्रीहरि नरसिंग अवतार स्थल, प्रह्लाद नगर, सिकलीगढ़ धरहरा,बनमनखी (पूर्णिया) के रूप में जानते हैं।  
जाने कैसे हुआ मंदिर का कायाकल्प 

बनमनखी प्रखंड के ही कुछ लोगों ने इस ऐतिहासिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया है। हरेक साल होली में यहाँ होलिका दहन का विशेष आयोजन किया जाता है। जिसे देखने के लिए देश-विदेश से षैलानी आते है। लोगो का जज्बा देख कर तत्कालीन अनुमंडला पदाधिकारी डॉ.मनोज कुमार ने ग्रामीणों का साथ दिया और सभी के अथक प्रयास से भगवान विष्णु का एक भव्य मंदिर बना। जिस खम्बे से भगवान ने नरसिंग के रूप में अवतार लिए उस जगह की घेराबंदी कर खम्बा को सुरक्षित रखा गया है। यहाँ के कोषाध्यक्ष का कहना है की इस धरोहर को बचाने के लिए विधायक से लेकर सांसद तक और पर्यटन मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक अनुरोध किया गया। मगर आजतक आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है। इस स्थल को प्र्यटन स्थल की सूची में दर्ज कर लिया जाता तो षायद इस क्षेत्र की तस्वीर बदली होती।
भक्त प्रलाद को लेकर सम्मत पर बैठी थी होलिका
हिन्दू पंचांग के अंतिम मास फाल्गुन की पूर्णिमा को होली का त्योहार मनाया जाता है। होली का त्योहार मनाए जाने के पीछ कई कथाएं प्रचलित हैं। होली की सबसे प्रमुख कथा में राजा हिरण्यकश्यप को राक्षसों का राजा कहा गया है। उसका एक पुत्र था जिसका नाम प्रह्लाद था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था। जब उसे पता चला कि प्रह्लाद विष्णु का भक्त है तो उसने प्रह्लाद को रोकने का काफी प्रयास किया। लेकिन तब भी प्रह्लाद की भगवान विष्णु की भक्ति कम नहीं हुई। यह देखकर हिरण्यकश्यप प्रह्लाद को यातनाएं देने लगा। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को पहाड़ से नीचे गिराया,हाथी के पैरों से कुचलने की कोशिश कीकिंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, होलिका।
उसे वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका के वरदान का सहारा लिया। होलिका प्रह्लाद को गोद में बैठाकर आग में प्रवेश कर गयी, फिर भी भगवान विष्णु की कृपा से तब भी भक्त प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रूप में होली का त्योहार मनाये जाने लगा।
नरसिंग अवतार ने ही किया था हिरण्यकाश्यप का वध
हिरण्यकाश्यप एक अहंकारी असुर था जिसकी कथा पुराणों में आती है। उसका वध नृसिंह अवतारी विष्णु द्वारा किया गया। हिरण्याक्ष उसका छोटा भाई था जिसका वध बराह ने किया था। विष्णु पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के आदिपुरुष काश्यप व उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए। हिरण्यकाश्यप और हिरण्याक्ष। हिरण्यकाश्यप ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में और न ही रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें व पूजा करे। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। भगवान विष्णु का हिरण्यकाश्यप का पुत्र प्रह्लाद घोर उपासक था और पिता के यातना व प्रताड़ना के बाद भी वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकाश्यप् ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ पर होलिका जलकर राख हो गई। अंतिम प्रयास में हिरण्यकाश्यप ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए। वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकाश्यप को महल के प्रवेश द्वार की चैखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज नाखूनों से जो न अस्त्र था न शस्त्र, मार डाला। इस प्रकार हिरण्यकाश्यप अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ। जिस खम्बे से भगवान ने अवतार लिया वह खम्बा आज भी पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के धरहरा में विद्यमान है।


Friday, March 10, 2017

प्रेस परिषद अध्यक्ष के आदेशों को नहीं मानते सदर थाना के दरोगा

प्रेस परिषद अध्यक्ष के आदेशों को नहीं मानते सदर थाना के दरोगा

  • प्रेस परिषद अध्यक्ष ने संवाद संकलन के लिए पत्रकारों को दी है स्वतंत्रता
  • -मुख्यालय डीएसपी ने मामले को गंभीरता से लिया
  • -बनारस के एक अपराधी परिवार से संवाद संकलन कर रहे पत्रकारों को दरोगा ने वार्ता नहीं करने की दी हिदायत


पप्पन/सहरसा: अखिल भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के आदेश का सहरसा सदर थाना पुलिस के लिए कोई मायने नहीं। सहरसा पुलिस ने अपराध में लिप्त एक परिवार से जानकारी लेने के क्रम में इन बातों को चरितार्थ भी किया है। प्रेस परिषद के अध्यक्ष ने हाल ही में देश के सभी पुलिस महानिदेशकों को संवाद संकलन करने वाले पत्रकारों को किसी भी तरह के अवरोध उत्पन्न नहीं करने की शख्त हिदायत दी थी। लेकिन सहरसा के सदर थाना पुलिस अपने पुराने रवैये पर आज भी कायम है। शुक्रवार को सहरसा सदर थाना में अपराध में लिप्त एक अपराधी के पत्नी अजिया से पत्रकारों द्वारा सवाल पूछे जाने के क्रम में वाकया सामन आया। सदर थाना पुलिस ने एक चोर गिरोह का पर्दाफास करने का दावा करते हुए शुक्रवार को पत्रकारों को विशेष जानकारी दी। इस क्रम में थाना सिरिस्ता में बैठी एक महिला को देख पत्रकारों की उत्सुकता बढ़ गई। थाना सिरिस्ता में बैठी महिला कोई और नहीं बल्कि गिरफ्तार अपराधी बनारस के शंकर पंडित की पत्नी थी। पत्रकार वार्ता के बाद पत्रकारों ने उस महिला से कुछ हकीकत जानने का जब प्रयास किया तो सदर थाना में पदस्थापित अवर निरीक्षक नितेश कुमार पूरे तैश में आ गये। अपना रौब झाड़ते हुये उन्होंने पत्रकारों को कड़ी हिदायत देते कहा कि आप लोगों को यहां किसी से भी किसी भी तरह का कोई सवाल करने का अधिकार नहीं है। उनके द्वारा दिये गये हिदायत के बाद पत्रकारों ने तत्काल अपनी चुप्पी साध लेना ही बेहतर माना। इस संबंध में जब सदर थानाध्यक्ष से संपर्क करने की कोशिश की गई तो बताया गया कि वे डीएम साहब के साथ बैठक में शामिल हैं। इस संबंध में प्रभारी एसडीपीओ सह डीएसपी मुख्यालय गणपति ठाकुर से जब बात की गई तो उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लिया तथा कहा की वे इस मामले को देखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नितेष कुमार ने गलती की है पत्रकारों को संवाद संकलन करने में कहीं भी किसी तरह की मनाही नहीं की जा सकती है।

Thursday, March 9, 2017

पुल व सड़क निर्माण के लिए कोसी नदी में जल सत्याग्रह





पुल व सड़क निर्माण के लिए कोसी नदी में जल सत्याग्रह


आगरदह से शहरबन्नी की दूरी महज 6 किलो मीटर है। आगरदह में पुल व सड़क का निर्माण हो जाता है तो आसानी से लोग न केवल खड़िया जिले की सीमा में प्रवेश कर जाएंगे बल्कि राज्य के कई प्रमुख शहरों से जुड़ाव हो जाएगा। चार जिलों की सीमा का सबसे निकटतम गांव आगरदह से समस्तीपुर, दरभंगा, खगड़िया व सहरसा की दूरी 6 किलो मीटर में ही सिमट जाएगी...
संजय सोनी/सहरसा: कोसी क्षेत्र के लोगों में शहर खगड़िया से जुड़ने के लिए गजब की बेचैनी बनी हुई है। खासकर कोसी तटबंध के अंदर निर्वासित सैकड़ों गांव के लोगों को प्रमंडलीय मुख्यालय सहरसा से ज्यादा आकर्षण खगड़िया शहर की तरफ है। वैसे लोकसभा क्षेत्र खगड़िया हप जाने से राजनीती के लिए भी खगड़िया ही जाना पड़ता है। लोगों को लगता है कि खगड़िया से जुड़ जाने के बाद राज्य की राजधानी पटना समेत बिहार के कई अन्य प्रमुख शहरों तक आसानी से पहूंची जा सकती है। अभी सहरसा जिले के सलखुआ प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत चानन पंचायत के डेंगराही घाट पर महासेतु निर्माण को लेकर चली 17 दिनों की आंदोलन के खत्म हुए दो दिन भी नहीं हुआ कि सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड क्षेत्र के कठडुमर घाट व आगरदह घाट से खगड़िया जिले के शहरबन्नी तक पुल व सड़क निर्माण के लिए 8 मार्च से पुल निर्माण संघर्ष समिति के बैनर तले अनिष्चितकालीन जल सत्याग्रह शुरू कर दिया है।
क्यों बने आगरदह में पुल व सड़क


शहरबन्नी केन्द्रीय मंत्री सह लोजपा सुप्रीमो रामबिलास पासवान का गृह क्षेत्र और शहर खगड़िया के गांव शहरबन्नी तक पुल व सड़क पहले से बनी हुई है। कमला नदी के बांध फुलतोड़ा में पुल बना हुआ है। इस वजह से खगड़िया का शहरबन्नी से सीधा जुड़ाव पहले से है। आगरदह से शहरबन्नी की दूरी महज 6 किलो मीटर है। आगरदह में पुल व सड़क का निर्माण हो जाता है तो आसानी से लोग न केवल खड़िया जिले की सीमा में प्रवेश कर जाएंगे बल्कि राज्य के कई प्रमुख शहरों से जुड़ाव हो जाएगा। चार जिलों की सीमा का सबसे निकटतम गांव आगरदह से समस्तीपुर, दरभंगा, खगड़िया व सहरसा की दूरी 6 किलो मीटर में ही सिमट जाएगी। इतना ही नहीं बेगुसराय, बखरी, हसनपुर व कुशेश्वर जाने वालों को काफी आसानी होगी।
कठडुमर घाट पर पुल बबने से लाभ
 प्रखंड सिमरी बख्तियारपुर के कठडुमर घाट पर पुल बन जाने से जिला मुख्यालय सहरसा आने वालों को नदी का झमेला खत्म हो जाएगा और सोनमनखी से सहरसा आने वालों को भी राहत होगी।
कौन लोग हैं जल सत्याग्रह में शामिल
जल सत्याग्रह में विभिन्न गांवों के कुल 11 लोग षामिल हैं। बेचू यादव, रणवीर यादव, सुरेन्द्र यादव, शम्भू पंडित, सुनील सिंह, अखिलेश मिस्त्री, मिथलेश यादव, बिरजू यादव आदि 8 मार्च की सुबह से ही कोसी नदी में मचान बांध कर जल सत्याग्रह कर पुल निर्माण की संकल्प पर अड़े हैं।
आंदोलन में कौन निभा रहे सहभागिता

पुल निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष सिंधु यादव, संयोजक सह भाजपा नेता अरविंद कुमार सिंह जमुनियां, पूर्व विधायक सह भाजपा नेता सुरेन्द्र यादव, रणविजय सिंह, चन्द्रकिशोर चौधरी, राजकिशोर यादव आदि के आलावा बिनचू यादव. रघुवीर यादव, अखिलेश यादव. सुभाष यादव, गणेश पंडित, अमरनाथ सिंह, रणविजय सिंह, सुरेंद्र यादव, सिन्धी यादव, रायगीर यादव, पंकज सिंह, सुधीर सिंह, दशरथ धर्म, रामदेव सादा, बेचु यादव, प्रमोद यादव, चंदेश्वरी यादव, हाकिम यादव, फूल कुमारी देवी,  देवकी देवी, अलोधनी देवी, लीला देवी, बेचनी देवी, मंजू देवी, गौरी देवी, बिजली देवी, अमला देवी, आशा देवी, अनिल देवी शामिल हैं।

Wednesday, July 6, 2016

कर्नाट वंश की देन है मिथिला की सौराठ सभागाछी


सभागाछी में हरेक साल सजती है दहेज रहित दुल्हों का बाजार 

सामाजिक व वैज्ञानिक कसौटी पर भी अन्तर्जातीय एवं समगौत्री विवाह में दोष

 

कर्नाट वंश की देन है मिथिला की सौराठ सभागाछी

संजय सोनी/सहरसा।
योग्य वंशावली विवाह सुविधा प्रदान करने के लिए कर्नाट वंश में तिरहुत के शासक हरिसिंह देव के नेतृत्व में 1296 ई. से 1310 ई. के बीच मिथिला के कुल 14 विभिन्न स्थानों पर बाजार के रूप में ”विवाह बाजार“ स्थापित किया गया था। इस बाजार में सौराठ, खामागढी, परतापुर, शिवहर, गोविंदपुर, फतेपुर, सजहौल, सुखसैना, अखराही, हेमानगर, बलुआ, बरौली, समौल एवं सहसौल प्रमुख रूप से शामिल था। लेकिन कालांतर में सभी विवाह बाजार खत्म हो गये और एकमात्र बाजार मधुबनी जिले के सौराठ गांव अवस्थित सभागाछी में लगने वाली विवाह बाजार आज भी अपने गिरती सामाजिक व्यवस्था व परंपरा के बीच अस्तित्व के साथ कायम है। तत्कालीन विवाह प्रथा में वर व वधु पक्ष स्वयं वर-वधु की तलाश नहीं किया करते थे बल्कि घटकैती परंपरा के जरीये ही वर व वधु की तलाश कर विवाह दान को संभव बनाया जाता था। बदलते परिवेश में सब कुछ बदला, अगर न बदली तो सौराठ सभा गाछी के दुल्लाह बाजार की अपनी संस्कृति व परंपरा। उत्तरी बिहार के सौराठ, खामागढी, परतापुर, शिवहर, गोविंदपुर, फतेपुर, सजहौल, सुखसैना, अखराही, हेमानगर, बलुआ, बरौली, समौल एवं सहसौल जैसे प्रमुख गांवों में वंशावली को जानने वाले प्रख्यात संस्कृत महापंडितों के गांव के रूप में जाना जाता था। 


बिहार के सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाली शहर दरभंगा से सटे जिला मधुबनी मुख्यालय से महज छह किलो मीटर दूर सौराठ गांव के सभागाछी में हरेक साल ज्येष्ठ व आषाढ माह में दुल्हों का बाजार लगता है। दुल्हों के इस बाजार में कभी सभी प्रकार की छोटे-बड़े नौकरियों के साथ-साथ आईएएस व आईपीएस वरों की भी बाजार में चट्टी बिछती थी। लेकिन दहेज संस्कृति के बढते कुप्रभाव ने दहेज रहित इस सभागाछी वर तलाश परंपरा को भी डस लिया। मैथिल ब्राह्मणों की इस संस्कृति ने कर्ण कायस्थों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। इस बाजार जन्मपत्री व राशि फल के आधार पर लड़के व लड़कियों की कुंडली मिलान की जाती है। राशि मिल जाने पर इस जोड़ों को पंजीकार अपनी पंजी में पंजीकृत कर शादी निश्चित कराने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरभंगा के प्रतापी राजा दरभंगा महाराजा के द्वारा 22 बीघा जमीन सौराठ सभागाछी को बतौर दान दिया गया था। लेकिन वर्तमान में सभागाछी के इस महत्वपूर्ण वैवाहिक सांस्कृतिक स्थल की विरासत को अतिक्रमणकारियों के द्वारा अतिक्रमित किया जा रहा है। कहा जाता है कि लग्न के समय में सौराठ सभागाछी में पहले हजारों की संख्यां में मिथिलंचल के विभिन्न क्षेत्रों से मैथिल ब्राह्मणों का जुटान होता था। लेकिन ये दिन अब लद गये।    
   
 
पंजीकरण की प्रथा व महत्वः-
तिरहुत के शासक हरिसिंह देव के समय में अन्तर्जातीय व समगौत्री विवाह को सामाजिक एवं वैज्ञानिकों कारणों को लेकर निषेध मानते हुए 1310 ई. में विधिवत शुरू की गयी थी। इस संदर्भ में सौराठ गांव निवासी पंजीकार सह ललित नारायण मिश्र स्मारक महाविद्यालय बीरपुर में संस्कृत के प्राध्यापक शंकर कुमार मिश्र ने कहा कि अन्तर्जातीय व समगौत्र विवाह न केवल सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिए घातक होता है बल्कि समाज के लिए भी वर्णशंकर की तरह होती है। वे बोले कि मनु स्मृति व आयुर्वेद की पुस्तक सरस संहिता में भी अन्तर्जातीय व समगौत्र विवाह के दोष पर विस्तार से चर्चा की गयी है। उन्होंने कहा कि मनोविज्ञान, जूलाॅजी, वनस्पति विज्ञान व बाॅयलाॅजी का 1802 से जानते हैं। लेकिन पंजीकरण की प्रथा 1310 में ही राजा हरिसिंह देव ने शुरू कर एक महान सामाजिक वैज्ञानिक व दर्शन का भी परिचय दिया है।
पंजीकरण का प्रारंभ पंडित गुणासर बाबू आज भी याद किये जाते हैं। 

वंशावली का मौजूद है अभिलेखागारः-
सौराठ सभागाछी के वंशावली अभिलेखागार में पंजीकृत पं. घनश्याम मिश्र की वंशावली से ही ज्ञात होता है कि मिथिला के कालीदास कविवर विद्यापति किस वंशज के हैं और उनके पैतृक परिवारों की वंशावली आज भी पंजीकृत है। पं. पुरूषोत्तम ठाकुर कविवर विद्यापति के ही वंशज हैं। कविवर विद्यापति की सेवा व भक्ति से भाव विहृवल होकर साक्षात महादेव उगना बनकर उनके साथ होने की कई शास्त्रों  में चर्चा है। रक्त संबंध जांच की प्रथा ही पंजीकारी प्रथा है। वंशावली से पूर्वजों के नाम, पता व ठिकाना सहित मूल व गौत्र का भी सही-सही जानकारी मिलती है। वंशावलियों को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रतिष्ठित मैथिल ब्राह्मण परिवारों की अमूल्य धरोहर की समान है।  प्रत्येक परिवारों के पूर्वजों की प्राचीनतम जानकारी अभिलेखागार में पंजीकृत पंजी से अब भी मिल जाती है। पंजीकार बिनोद झा ने अपने पंजीकार पिता सह भविष्यवेत्ता स्व. हरेकृष्ण झा की चर्चा करते हुए कहा कि वे कहते थे कि केवल सौराठ गांव में 42 गौत्र व 7 मूल के मैथिल ब्राह्मण परिवार हैं। खून के रिश्तो के घालमेल से पीढी वैज्ञानिक व सामाजिक रूप दूषित हो जाती है। वंशावली पंजी से मैथिल ब्राह्मणों के 10 पीढी तक की जानकारी मिलती है। सात पुश्त तक समगौत्री माना जाता है और वैसे रिश्तो में कोई संबंध की चर्चा तक नहीं होती है। पंजीकारों में स्व. विष्णुदत्त मिश्र, स्व. षिवदत्त मिश्र एवं उनके पुत्र शंकर कुमार मिश्र, सकरौनी निवासी मोहन मिश्र की अपनी ख्याति है। पंजीकार का कोई शुल्क नहीं होता है और लाभार्थी के स्वेच्छा पर ही शुल्क की राशि निर्भर करती है।
सीता स्वयंवर से मिलती है प्रेरणाः-
मिथिलांचल क्षेत्र राजा जनक की नगरी के रूप में भी प्रख्यात है और रामायण महाकाव्य में सीता के लिए आहूत स्वयंवर से भी इस प्रथा की ज्ञात होती है। यही वजह है कि मधुबनी के गांव सौराठ के सभागाछी में स्वयंवर की तरह ही दूल्हों का बाजार लगता है और वरों की प्रतिभा व विलक्षण को आधार मानकर ही दहेज रहित विवाह के लिए वधु पक्ष चयन करते हैं।  

2016 में मिथिलांचल के सौराठ सभागाछी में 10 जुलाई से शुरू होगी दुल्हों का बाजार   
मिथिलांचल के मैथिल ब्राह्मणों द्वारा पीढियों से संरक्षित परम्परा व वर-वधु चयन के लिए ऐतिहासिक सौराठ सभा स्थल पर दहेज रहित दुल्हों के बाजार के लिए सभी आवष्यक तैयारियां शुरू है। सौराठ सभा प्रवासी वर-वधु पक्ष के लोगों के लिए ठहरने व भोजन की भी व्यवस्था सौराठ सभा समिति की ओर से की जा रही है।इधर, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन के सचिव इन्द्रमोहन झा ने बताया कि मिथिलांचल के पूर्वी क्षेत्र सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार के वर-वधु पक्ष के मैथिल ब्राह्मणों को मोबाईल संदेश भेजकर सभा में पहूंचने का आमंत्रण भेजा गया है। इसके आलावा आसपास के गांव पंडोल, डीहरोज, कल्याणपुर, सरिसपाही, जमसम, हाटी, बटुरी, मेघौल, गंगौली आदि गांवों के लोगों को भी सभा स्थल पर पहूंचने का आग्रह किया गया है। सौराठ सभा समिति के सचिव डाॅ. शेखर चन्द्र मिश्र ने कहा कि सभा स्थल पर प्रवासी वर-वधु प़क्ष के लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो इसका पूरा ख्याल रखा जा रहा है। ताकि सौराठ सभागाछी के प्रति लोगों में खत्म हो रही आकर्षण को लौटाया जा सके। 
सौराठ कैसे बना सभा की गाछी
मुगलकाल में अपने पतन के दिनों से उबड़ने के बाद मैथिल ब्राह्मणों ने मिथिलांचल के सौराठ स्थित एक गाछी में ही बैठक की परंपरा की शुरूआत किया। इस बैठक में ही अपने पतन व नये सिरे से उदय पर मैथिल ब्राह्मणों व विद्वानों ने आपस में न केवल बहस शुरू की बल्कि सामाजिक ताना-बाना पर भी शास्त्रार्थ किया करते थे। उस स्थल की निरंतरता को देखते हुए सभागाछी का नामाकरण कर दिया और आज सभागाछी देश व दुनियां में दूल्हों के बाजार के लिए प्रसिद्ध है।  
क्या कहते हैं सौराठ वासीः-   
मधुबनी के प्रगतिशील विचारक संजय झा कहते हैं कि मैथिल ब्राह्मणों सहित ब्राह्मण समाज के लिए सौराठ सभा गाछी एक धरोहर है जहां दहेज रहित विवाह की परंपरा रही है। लेकिन सामाजिक किृतियों की वजह से सभागाछी के महत्व में गिरावट आयी है। उन्होंने कहा कि इस धरोहर को बचाने के लिए सभा के समय निष्चित रूप से सभागाछी में सभी ब्राह्मणों को आना चाहिए।


तिरहुत में कर्नाट शासक का उदय व अंतः-
संपूर्ण मिथिलाचंचल की धरती पर सांस्कृतिक विरासत को बनाये रखने की दिशा में कर्नाट वंश के अंतिम शासक हरिसिंह देव का बड़ा ही सराहनीय योगदान रहा है। लेकिन बिहार व बंगाल पर गयासुद्दीन तुगलक के द्वारा 1324-25 ई. में आधिपत्य कर लिए जाने के बाद शासक हरिसिंह देव अपने को असहज मानने लगे। उस समय तिरहुत का शासक हरिसिंह देव ही थे। शासक हरिसिंह देव ने तुर्की सेना से हार मानकर छुपने के लिए नेपाल की तराई में भी शरण लिये। इस प्रकार उत्तरी व पूर्व मध्य बिहार से कर्नाट वंश का 1378 ई. में आधिपत्य समाप्त हो गया।
यह बताना गैर जरूरी है कि तिरहुत में कर्नाट राज्य का 1097 ई. से 1098 ई. तक में ही रामपाल के शासनकाल में उदय हो गया था। कर्नाट राज्य के संस्थापक नान्यदेव एक महान शासक थे। नान्यदेव का पुत्र गंगदेव भी एक योग्य शासक बना। नान्यदेव ने कर्नाट की राजधानी सिमरॉवगढ़ बनाया। कर्नाट शासकों के कालखंड को मिथिला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। मिथिला में वैन वार वंश के शासनकाल में ही स्थिरता व प्रगति आयी। नान्यदेव के साथ सेन वंश राजाओं से युद्ध होता रहता था। सेन वंश के संस्थापक सामंत सेन था। विजय सेन, बल्लाल्सेन, लक्ष्मण सेन आदि भी शासक बने। सेन वंश के शासकों ने बंगाल व बिहार पर शासन किया। विजय सेन शैव धर्मानुयायी थे। उन्होंने बंगाल के देवपाड़ा में एक झील का भी निर्माण करवाया। विजय सेन एक लेखक भी थे और वे ‘दान सागर’ व ‘अद्भुलत सागर’ दो ग्रन्थों की रचना भी की। सेन वंश का अंतिम शासक लक्ष्मण सेन रहा। हल्लायुद्ध इसका प्रसिद्ध मंत्री व न्यायाधीश था। गीत गोविन्द के रचयिता जयदेव भी लक्ष्मण सेन शासक के दरबारी कवि थे। लक्ष्मण सेन वैष्णव धर्मानुयायी थे। सेन राजाओं ने अपना साम्राज्य विस्तार के दौरान 1160 ई. में गया के शासक गोविन्दपाल से युद्ध किया। 1124 ई. में गहड़वाल शासक गोविन्द पाल ने मनेर तक अभियान चलाया।
जयचन्द्र ने 1175-75 ई. में पटना व 1183 ई. के मध्य गया को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। कर्नाट वंश के शासक नरसिंह देव बंगाल के शासक से परेशान होकर तुर्की का सहयोग लिया। उस समय बख्तियार खिलजी भी बिहार आए और नरसिंह देव को धन-दौलत देकर न केवल संतुष्ट किया बल्कि नरसिंह देव के साम्राज्य को तिरहुत से दरभंगा क्षेत्र तक फैलाने में मदद किया। इसी दौरान कर्नाट वंश के शासक सामान्य रूप से दिल्ली सल्तनत के प्रांतपति नियुक्तक किये गये। गयासुद्दीन तुगलक ने 1324-25 ई. में बिहार व बंगाल पर आधिपत्य कर लिया। उस समय तिरहुत का शासक हरिसिंह देव था। शासक हरिसिंह देव ने तुर्की सेना से हार मानकर छुपने के लिए नेपाल की तराई में भी षरण लिये। इस प्रकार उत्तरी व पूर्व मध्य बिहार से कर्नाट वंश का 1378 ई. में आधिपत्य समाप्त हो गया।

Thursday, June 9, 2016

नेपाल व भारतीय प्रभाग में बाढ़ पूर्व कटाव निरोधी कार्यों से मंत्री संतुष्ट




सूबे के जल संसाधन मंत्री नेपाल प्रभाग के पूर्वी बहोत्थान बांध का किया निरीक्षण


संजय सोनी/सहरसा
कोसी नदी के नेपाल प्रभाग में पड़ने वाले पूर्वी बहोत्थान बांध का जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन उर्फ़ ललन प्रसाद सिंह ने अपने अमलों के साथ गुरूवार को निरीक्षण किया और कहा कि सहरसा से कोसी बराज व कोसी बराज तक से पुलटेगौरा तक नेपाल प्रभाग में पड़ने वाले सभी स्परो पर बाढ़ पूर्व हुए कटाव निरोधात्मक कार्य संतोषप्रद है। मंत्री इस दौरे में सबसे पहले बुधवार को हेलीकाप्टर से सहरसा पहुचे और सड़क मार्ग से पूर्वी कोसी तटबंध का निरीक्षण करते हुए बीरपुर पहुचे। बीरपुर एसा रात्रि विश्राम के बाद अन्य निर्धारित विभागीय कार्यक्रमों में हिस्सा लिए।
जल संसाधन मंत्री श्री सिंह सुपौल के दो दिवसीय दौरे के  दौरान गुरूवार को कोसी नदी के नेपाल प्रभाग में पड़ने वाले पूर्वी बांध का निरीक्षण किया और बाढ़ पूर्व कटाव निरोधात्मक कार्यो का भी जायजा लिया। मौके पर  विभाग के प्रधान सचिव अरुण सिंह, इंजिनियर इन चीफ इंदुभूषण कुमार व राजेश कुमार,  मुख्य अभियंता प्रकाश दास, अधीक्षण अभियंता दिनेश चौधरी, कार्यपालक अभियंता विमल कुमार, शशि कान्त सिन्हा,एसडीओ संजय कुमार आदि प्रमुख रूप से मौजूद थे। मंत्री का काफिला सबसे पहले पूर्वी बहोत्थान बांध के स्पर संख्या 26.88 किमी, ,27.10 किमी के बाद पुलटेगौरा के स्पर संख्या 11 का भी निरिक्षण किया। तटबंधों के   निरीक्षण के बाद वीरपुर कोसी अतिथिशाला में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मंत्री श्री सिंह ने कहा कि कोसी नदी के पूर्वी बांध पूरी तरह सुरक्षित हैं। हमने सहरसा से कोसी बराज व कोसी बराज तक से पुलटेगौरा तक का निरीक्षण किया है। निरीक्षण के बाद नेपाल प्रभाग में पड़ने वाले सभी स्परो पर बाढ़ पूर्व कराये गए कटाव निरोधात्मक कार्यों के प्रति संतोष प्रकट किया। जबकि मंत्री ने सहरसा से सुपौल के बीच 7 बिन्दुओं को संवेदनशील बताते हुए सतत निगरानी का निर्देश दिया।
 मंत्री ने कहा कि 15 जून से सभी अभियंताओ को चौबीस घंटे और सातों दिन बांध पर रहना पड़ेगा। कोसी बराज के गेट के सम्बन्ध में पूछे गए सवाल के जवाब में जानकारी देते हुए मंत्री ने बताया कि बराज के गेट का संचालन पटना कंट्रोल द्वारा किया जा रहा है अब 56 फाटकों में से मात्र 2 फाटक की स्थिति ठीक करनी है। इस बाबत मेकेनिकल विभाग के कार्यपालक अभियंता को आज के आज ही वीरपुर बुलाया गया।
 पत्रकारों के प्रश्न स्पर संख्या 26.88  किमी व 27.10 किमी  पर हर साल लाखोकरोड़ो की राशि खर्च होने के वावजूद क्या कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता है के के जवाब में मंत्री ने कहा कि यदि आपके पास कोई समाधान हो तो बताए। मंत्री श्री सिंह ने कहा कि कोसी की धारा लगातार अपनी दिशा बदलती रहती है और पानी कब कितना आ जाये ये कोई नहीं बता सकता है। फिलहाल सभी स्पर सुरक्षित हैं और काम भी अच्छा हुआ है।

Tuesday, June 7, 2016

पर्यटन मानचित्र से वंचित ऐतिहासिक माँ देवी वन दुर्गा हरदी


पर्यटन मानचित्र से वंचित ऐतिहासिक माँ देवी वन दुर्गा हरदी  

 
  • -पांडव स्थापित वन दुर्गा स्थान हरदी आज भी उपेक्षित

  • वीर लौरिक के आराधना का केंद्र रहा हरदी वन दुर्गा स्थान

  • माँ देवी वन दुर्गा स्थान में प्रधानमंत्री नेहरु के भी पड़े कदम   

सहरसा

धार्मिक स्थल व धरोहरों के लिए कोसी क्षेत्र की अपनी एक गौरवमयी इतिहास है। कोसी क्षेत्र के गर्भ में एक से एक देवी-देवता व मठ-मंदीरे तो हैं, लेकिन पर्यटन विभाग के पास ऐसे धरोहरों को संजोने व विकसित करने के लिए कोई कारगर योजना नहीं है। यही वजह है कि पांडवों के अज्ञातवाशकाल के दौरान कोसी प्रमंडल के सुपौल जिले के हरदी गांव में प्रतिष्ठापित देवी वन दुर्गा मंदिर आज भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। वैसे कहा जाता है कि राज्य व केन्द्र सरकार ने वर्ष 2005 में युनेस्को की मदद से इसके जीर्णोद्धार के लिए विस्तारित कार्य योजना बनाये जाने की चर्चा ईलाके के प्रबुद्धजन करते हैं। लेकिन वह कार्य योजन किस फाईल में गुम हो गयी यह भी गहन जांच का विषय है।
सबसे चौकाने वाली बात तो यह भी है की भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी अपने प्रथम कार्यकाल में ही माँ देवी वन दुर्गा की पूजा-अर्चना करने पहुचे थे। इसका ज़िक्र उनकी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भी न केवल वर्णित है बल्कि स्थल के महत्व की भी बखान है।

सुपौल जिला मुख्यालय महज़ 10 किलो मीटर दूर सुपौल-सिंहेश्वर मुख्य मार्ग अवस्थित ऐतिहासिक  हरदी वन दुर्गास्थान आम जनमानस में असीम आस्था व विश्वास का केंद्र के साथ-साथ शक्ति पीठ के रूप में विख्यात है। इस धार्मिक स्थल की मान्यता है कि पालवंशकाल में यह स्थल काफी ख्याति प्राप्त बाजारों में सुमार था। इसके गवाह केन्द्रीय रेफरेंस पुस्तकालय व वाचस्पति संग्रहालय में रखी महत्वपूर्ण ताम्रपत्र आज भी है। यहां हरेक साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर वीर लौरिक की जयंती एवं भव्य मेला आयोजन की परम्परा रही है । इस मेला का आयोजन किसके द्वारा और कब शुरू की गयी है इसकी भी जानकारी किसी के पास नही है।
मेला ओ वन दुर्गा स्थल के बारे में लोगों का कहना है कि पाण्डवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान बिराटनगर जाने के वक्त विश्रामावधि काल में हरदी गांव में देवी वन दुर्गा को प्रतिष्ठापित की गयी थी। तब से लेकर अब तक इस स्थल पर मां की पूजा-अर्चणा के लिए प्रतिदिन भक्तों की भीड़ उमड़ती है ।

यह भी कहा जाता है कि 7 वीं शताब्दी के आस-पास बंगाल के राजा व पालवंश के संस्थापक गोपाल आर्य का यहां राजधानी एवं सबसे बड़ी सैनिक छावनी हुआ करता था। यह स्थल आज भी एक प्रसिद्ध शक्ति पीठ के रूप में देश-विदेश में भी चर्चित है। जनश्रुति है कि मां  देवी वनदुर्गा की परम उपासक महान योद्धा वीर लौरिक मन्यार उत्तर प्रदेश के गौरा गांव से पांचवीं शताब्दी में पूजा-अर्चणा करने के लिए हरदी गांव आगमन हुआ था। यहां के राजा महबैर  अपने प्रजा के साथ अत्याचार व जुल्म किया करते थे।  राजा महबैर  के आतंक से निजात दिलाने के  फैसले के साथ ही वीर लौरिक मन्यार यहीं के होकर रह गये और फिर कभी वापस लौट कर अपने गांव गौरा नहीं गये। कहते हैं कि राजा महिचन्द साह जिनका साक्ष्य आज भी यहां महिचंदा गढ़ी व महिचंदा गांव के नाम से प्रसिद्ध है। राजा महिचन्द साह ने सेनापति बेंगठा चमार, बारूदी चौकीदार, सजल धोबी और सांभर को साथ लेकर हरदी के राजा महबैर को न केवल पराजित किया बल्कि अपना साम्राज्य स्थापित किया और  एक कुशल प्रजा पालक राजा के रूप में विख्यात हुए। इतना ही नहीं हरदी स्थान से 2 किमी पूरब रामनगर सीमा क्षेत्र स्थित वीर लौरिक के नाम से 15 डिसमील जमीन आज भी दस्तावेज में दर्ज है, जिसे लौरिकडीह के नाम से जाना जाता है। 
सनद हो कि आज भी इस स्थल पर फकत पांच फीट जमीन की खुदाई करने पर कई महत्वपूर्ण अवशेषों की प्राप्ति होती है।  इस स्थल को देखने व पूजा-अर्चना करने देश-विदेश से पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है।