Thursday, June 30, 2011

कंसार की कहानी


कोसी व मिथिला की संस्कृति कंसार खो रही है पहचान    
  • कंसार पर नवेली दुल्हन से लेकर दादी अम्मा तक को जाने की थी छूट

              कंसारीन प्रथा महिलाओं के स्वावलंबन को दर्षाती है

              कंसारीन महिलाओं को गांव की किसी भी दरवाजे पर मिलती थी खासे इज्जत

    कोसी व मिथिला की संस्कृति सांझा चुल्हा यानि कंसार खत्म होने की कगार पर पहूंच चुकी है.सांझा चुल्हा की तर्ज पर कोसी व मिथिला की गांव घरों में कंसार की अपनी एक अलग महत्व व गरिमा थी.जो कि अब मिटने के कगार पर पहूंच गयी है.
    कंसार चलाने वाली औरत को कंसारीन कहा जाता था. कंसारीन से किसी भी घरों की कहानी छूपी नहीं होती थी. कंसार में गांव की औरतें शाम को भूुजा भूुजने अक्सर आया करती थी. इसी बहाने गांव की नयी नवेली दुल्हन से लेकर अम्माओं की दिल की भरास भी आपस में बांटी जाती थी.इससे महिलाओं के दिल की भरास के साथ-साथ मन भी बहल जाया करता था. अब यह प्रथा करीब-करीब खत्म हो चुकी है. गांव की महिलाओं को सभी जगह जाने की इजाजत भी नहीं थी. कंसार हीं एक ऐसा केंद्र हुआ करता था जहां गांव की नवेली दुल्हन से लेकर दादी अम्मा तक जाया करती थी. इसलिए गांव-घरों में गांव की नवेली दुल्हन से लेकर दादी अम्मा तक कंसार का ज्यादा महत्व था और कंसारीन महिलाओं की गांव की किसी भी दरवाजे पर खासे इज्जत मिलती थी.
    गांव के जितने बड़े लोग उनसे उतनी बड़ी मिहनताना की आमदनी कंसारिनों को हुआ करता था. कंसारीन उसी आमदनी के बूते अपने परिवारों का भरण-पोषण किया करती थी, वहीं एक महिला के बल पर परिवार किस कदर चलता था वह आज भी महिलाओं के स्वावलंबन को दर्शाती है.



पहले गांव की गैर मजरुआ जमीन में इस तरह का कारोबार ज्यादा चलता था. गांव घरों में अनेकों कंसार होने की वजह से कंसारीनों के बीच भी अपनी ग्राहकों को लेकर प्रतिस्पर्धा व झगड़ा हुआ करता था. कंसारीनों के बीच गांव के बड़े लोगों की भूंजा-भूजने की भारी स्पर्धा होती थी.जिस किसी नवेली दुल्हन को भुजा-भुजने की कला नहीं होती थी उसे कंसारीन या गांव की अम्मा भूंजने की कला हंसी खुशी सिखा देती थी. इसमें चुगली नहीं होती थी न हीं हिनसताय मानी जाती थी. आज न सांझा चुल्हा देखने को मिल रही है और न हीं कंसारीन के उस कंसार की खपड़ी में भूंजा फरफराने की आवाज हीं सुनाई देती है. अगर किसी गांव में कहीं कंसार बची हुई है तो वह भी दम तोड़ने की स्थिति में आ पहूंची है. अब कंसारीनों को न तो मुफ्त में बगानों की सुखी पŸिायां हीं मिल पाती है और न हीं भूजने वाली महिलायें हीं कंसार तक पहूंच पाती है.
सरकार को चाहिए कि ग्रामीण इलाकों से मिट रही इस संस्कृति को बचाने के लिए कंसारीनों भी सामुदायिक चुल्हा उपलब्ध कराये और आर्थिक मदद प्रदान करे.

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