Saturday, July 29, 2017

आखिर कौन करेगा गौशाला का जीर्णोद्धार





अध्यक्ष व सचिव के समक्ष सार्वजनिक संपत्ति को बचाने की चुनौती  
एसडीओ,शौरभ जोरवाल   
सचिव,शालिग्राम देव 
राजीव झा/सहरसा: कई दशकों के बाद बनगांव गौशाला के जीर्णोद्धार की उम्मीद जगी है। ऐसा पहला मौका है जब गौशाला के पदेन अध्यक्ष के पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ व कर्मठ सदर अनुमंडल पदाधिकारी के रूप में सौरभ जोरवाल हैं तो सचिव के पद पर भाजपा के अनुभवी व पूर्व जिला अध्यक्ष शालिग्राम देव। इतना तो सच है कि अब तक बनगांव गौशाला के सचिव पद पर जो भी रहे हों उनमें एक के कार्यकाल को छोड़कर सबों ने गौशाला का गर विकास नही चाहा तो बर्बादी भी नही चाहा। खैर, इनमें जिन पूर्व सचिवों की बात करेंगे सब के सब स्वर्गीय हो गए हैं। अभी हाल ही में 29 मार्च 2017 को सचिव नरोत्तम तिवारी का निधन हुआ है। अब 23 जुलाई को शालिग्राम देव को सचिव मनोनयन किया गया है।
गौशाला की कब हुई थी स्थापना: वर्ष 1921 में बनगांव गौशाला की स्थापना हुई थी। बनगांव गौशाला बरियाही बाजार के सचिव जैसे पद को 70 के दशक तक शहर के प्रमुख व्यवसायी व समाजसेवी शरीखे लोगों में स्व. मनीलाल तुलस्यिान के बाद क्रमवार रूप से स्व. रामदेव साह, स्व. सत्यनारायण प्रसाद गुप्ता, स्व. नरोत्तम तिवारी आसीन रहे और सुशोभित करते हुए सफल संचालन भी किया। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि कभी किसी ने गौशाला का विकास नही किया तो लूटा भी नहीं।
अध्यक्ष व सचिव के समक्ष चुनौती: अब वर्तमान अध्यक्ष व सचिव के समक्ष गौशाला के सफल संचालन की सबसे बड़ी चुनौती है तो करोड़ों की संपत्ति को भूमाफियाओं से अतिक्रमण मुक्त कराना उससे बड़ी चुनौती सामने है। 
सार्वजनिक संपत्ति पर 25 लोगों का कब्ज़ा: इस सार्वजनिक संपत्ति पर कथित भाड़ेदारों की नजर ऐसी है कि 50 रुपये से 200 तक का ही बड़े-बड़े कमरों का किराया होने पर भी समय पर कभी भुगतान नही किया गया है। इस वजह से शहर के चांदनी चौक स्थित गौशाला के 25 किरायेदारों पर 3 लाख 39 हजार 106 रुपया बांकी है। जिसकी वसूली के साथ-साथ उन मकानों व परिसर को मुक्त करवाना भी जटिल कार्य है। बताया जाता है कि बरियाही बाजार स्थित गौशाला के पास 12 बीघा 13 कट्ठा जमीन है। जिसमे सुधा डेयरी के दूध शीतलीकरण के लिए करीब दो बीघा दिया गया है और शेष जमीन बटिया पर 3 हजार रूपये सालाना पर दिया हुआ है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इतने बड़े गौशाला में शहर व बरियाही लेकर महज पांच गायें ही है। दो कर्मचारी। मतलब साफ है कि अब गौशाला लुटेरी टकसाल बनी रही और आने वाले नोट छापते रहे। अब देखना यह है कि इस टकसाल पर पाबंदी लग पाती है या नही या फिर अवैध किरायेदारों समेत न्यूनत्तम दरों का लाभ उठाकर ठस्सा मार कर गौशाला को हड़पने वालों से मुक्ति मिलती है या नही।
कोसी प्रमंडल में है दर्जनों गौशाला: कोसी में कभी किसी बड़े नेताओं ने न तो गौ रक्षा की बात की है और न ही गौशाला के सम्पत्तियों की सुरक्षा चाही है। लिहाजा कोसी प्रमंडल के सहरसा, मधेपुरा व सुपौल जिले के एक दर्जन से अधिक गौशालाओं की सैकड़ों एकड़ जमीन अतिक्रमणकारियों की भेंट चढ रही है और जिस गौ माता की रक्षा के नाम पर देश के विभिन्न प्रांतों में बबाल मची हुई है, वह गौ माता इन सड़कों पर लावारिस हालत में चारा चरने के लिए भटकती मिल सकती है। यूं कही जा सकती है कि कोसी में गौशाला के बहाने राम नाम की लूट मची है और गौशाला अतिक्रमणकारी लोगों के आमदनी का एक आसान जरीया बना हुआ है। जबकि सूबे में गौशाला विकास पदाधिकारी भी कार्यरत हैं। आखिर ये कैसा विकास और किस तरह के विकास के लिए काम कर रही है।

कोई नहीं उठाता है आवाज: गौशाला के विकास के लिए इस क्षेत्र के विधायक से लेकर सांसद तक कभी अपना मुंह नहीं खोले हैं। जो भी मुंह खोले हैं वह भी गौशाला व गायों के हक में नहीं बल्कि सचिवों को खुश करने के लिए ही। इस करोड़ों की सार्वजनिक सम्पत्ति पर सरकार व प्रशासन किसी की नजर नहीं है। गौशाला की सम्पत्ति व आमदनी को सिर्फ कागज पर ही लूट करने का सिलसिला जारी रहा। गाय दान देने वालों की कमी नहीं है। लेकिन गाय दान दे तो कहां दें। लिहाजा लोग वैसे गायों की बिक्री कर दे रहे हैं और वह गायें मवेशी हाटों के माध्यम से तस्करी होकर बांग्लादेश चला जा रहा है।  

Tuesday, July 25, 2017

मंथर गति से बहाव कर रही कोसी कभी भी हो सकती है उग्र


मंथर गति से बहाव कर रही कोसी कभी भी हो सकती है उग्र
26 जुलाई को 2 लाख 14 हजार 200 क्यूसेक जल निस्सरण का है रिकार्ड


संजय सोनी/सहरसा: अभी कोसी नदी की प्रलंयकारी धारा जलवृद्धि के अभाव में मंथर गति से बहाव कर रही है। इस बार बाढ के मौसम में व मानसून के दस्तक के बाद भी बराह क्षेत्र से लेकर कोसी बराज तक के जल निस्रण का वैसा कोई रिकार्ड नहीं है जो पूर्वी कोसी तटबंध के जरीये कोहराम मचा सकती है। लेकिन पिछले साल 26 जुलाई 2016 को कोसी नदी के जल निस्सरण के आंकड़ों पर गौर करें तो अभियंताओं को पूर्वी कोसी तटबंध के सभी नाजुक बिन्दुओं पर आज और अभी से ही मुष्तैद रहने की जरूरत है। वैसे भी इस साल पूर्वी कोसी तटबंध के किमी 78.60 का स्पर तटबंध पर खतरा उत्पन्न करने के साथ-साथ अभियंताओं के लिए लूट का खजाना ही साबित हो रही है।
कोसी नदी के बराह क्षेत्र में 24 जुलाई को सुबह 6 बजे 89 हजार 500 क्यूसेक जल निस्सरण के साथ दोपहर 2 बजे घटकर 86 हजार 900 पर पहूंच गयी। जबकि कोसी बराज में सुबह 6 बजे एक लाख 41 हजार 950 क्यूसेक जल निस्सरण के साथ दोपहर 2 बजे घटकर एक लाख 33 हजार 915 क्यूसेक जल निस्सरण पर पहूंच गयी। जबकि 25 जुलाई को बराह क्षेत्र में एक लाख 1750 क्यूसेक एवं कोसी बराज से एक लाख 38 हजार 765 क्यूसेक जल निस्सरण की खबर है। पूर्व के जल निस्सरण एवं 2425 जुलाई के मौसम का मिजाज यह साबित कर रहा है कि नेपाल प्रभाग के धनकुट्टा, धरान बाजार, ओखलढुंगा व टपलेजुंग में बारिष होने की खबर है और इन क्षेत्रों में बारिया होने से ही कोसी नदी में जल वृद्धि होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। जबकि साल 2016 में 26 जुलाई को 2 लाख 14 हजार 200 क्यूसेक जल निस्सरण का रिकार्ड है। यह रिकार्ड भले ही बाढ के लिए कोई अधिकतम जल निस्सरण नहीं है। लेकिन पूर्वी कोसी तटबंध के स्परों पर दवाब बनाने के लिए भी कम नहीं है। हालांकि बिहार के कोसी बेसिन में बारिष की स्थिति अभी खतरा पैदा करने लायक नहीं है।
 लेकिन अगर मौसम का मिजाज बदला तो कुछ भी कहना मुश्किल होगा। वैसे भी विशेषज्ञ बताते हैं की अभी नेपाल के तराई क्षेत्रों में ही हल्की बारिश हो रही है।अगर हिमालय के मध्य क्षेत्रों में बारिश हुई तो बाढ़ का खतरा उत्पन्न होना ही। अब तक कोसी नदी में आयी बाढ से जिले के नवहट्टा प्रखंड के केदली पंचायत के रामपुर व शाहपुर पंचायत के शाहपुर गांव के 66 परिवारों का घर उजड़ गया। जानकारी के मुताविक इन सभी कटाव पीड़ितों को सरकारी सहायता भी मिल चुकी है


Monday, July 10, 2017

मध्य हिमालय क्षेत्र में बारिश हुई तो भयंकर बाढ का करना पड़ सकता है सामना

अर्ली मानसून की आहट को सरकार को माननी चाहिए बाढ की आहट 


कोसी नदी का पानी भी गंगा ग्रहण नहीं कर पा रही है। कोसी नदी व गंगा नदी दोनों का तल उंचा हो गया है और सभी सहाय नदियों के तल भी उंची हो गयी है। यही वजह है कि गंगा का तल उंचा हो जाने के कारण कोसी का अत्याधिक जल निस्सरण बाढ की तबाही मचा सकती है...





दैनिक खबर/सहरसाः इस साल कोसी में बाढ की तस्वीर बदल सकती है। कोसी जहां अभी से ही उफनाने लगी है वहीं कोसी की सभी सहायक नदियों में भी बाढ आ गयी है। कोसी की सहायक नदियों की बाढ से बचाव के लिए न तो सरकार के पास कोई योजना है और न ही परियोजना। इसलिए सरकार, विभाग व प्रशासन को मानसून की तेवर को भांपते हुए बाढ सुरक्षात्मक व संघर्षात्मक कार्यों को युद्ध स्तर पर करने की जरूरत नदी विशेषज्ञ बता रहे हैं।

नदी विशेषज्ञ रणजीव कहते हैं कि इस साल अर्ली मानसून है। अभी इतनी बारिश नहीं होनी चाहिए। जबकि अक्टूबर तक बारिश होनी है। अभी नेपाल व हिमालय के तराई क्षेत्रों में ही बारिश हो रही है। अगर मध्य हिमालय क्षेत्रों में बारिश हुई तो कोसी में बाढ की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए ज्यादा पानी आने पर कोसी बांध के बाहर बहने लगेगी। कोसी नदी का पानी भी गंगा ग्रहण नहीं कर पा रही है। कोसी नदी व गंगा नदी दोनों का तल उंचा हो गया है और सभी सहाय नदियों के तल भी उंची हो गयी है। यही वजह है कि गंगा का तल उंचा हो जाने के कारण कोसी का अत्याधिक जल निस्सरण बाढ की तबाही मचा सकती है। इसलिए सरकार को अर्ली मानसून की आहट को बाढ की आहट मानकर सारी तैयारियां करनी चाहिए। इसके अनुसार सरकार को बहुत ज्यादा तैयारी करने की जरूरत है जो नहीं हो पा रही है। श्री रणजीव कहते हैं कि 2008 की कुसहा त्रासदी के बाद कोसी नदी नेपाल से लेकर कोपरिया व कुरसेला तक पूरब की तरफ शिफ्ट कर प्रवाह कर रही है और साथ ही गंगा का बेड लेबल भी काफी उंचा हो गया है। यही वजह है कि गंगा नदी भी अब कुरसेला में कोसी के पानी को अपनी तरफ नहीं खींच पा रही है। हल्की बारिश में कोसी सहित सभी सहायक नदियों की यह हाल है तो बारिश की सदाबहार मौसम में बाढ का क्या हाल होगा। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने के लिए श्री रणजीव कहते हैं कि बाढ का स्थाई समाधान किये बगैर बाढ से सुरक्षा की गारंटी नहीं की जा सकती है।

नेपाल प्रभाग में नदी घाटियों के लिए वर्षा का पूर्वानुमान

नेपाल प्रभाग के धनकुट्टा, धरान बाजार, ओखलकुंडा व टापलेजुंग की बारिश का असर कोसी नदी पर सीधे पड़ती है। जबकि नेपाल के बिराट नगर में बारिश होने से महानंदा नदी में जलवृद्धि होती है। इस बार 10 जुलाई 2017 को धनकुट्टा में 23.62 11 जुलाई को 4.96, धरान बाजार में 35.36 11 जुलाई को 1.52, ओखलकुंडा में 10 जुलाई को 19.75 11 जुलाई को 1.35 एवं टापलेजुंग में 10 जुलाई को 23.62 11 जुलाई को 15.74 बारिश होने का पूर्वानुमान लगाया गया है। अब अनुमान सही हो रही है। जबकि इन सभी क्षेत्रों की औसतन बारिश का 10 जुलाई को 31.17, 11 जुलाई को 17.75 एवं 12 जुलाई को 4.30 अनुमान लगाया गया है। जबकि बिराटनगर में 10 जुलाई को 57.26 11 जुलाई को 0.79 बारिश का अनुमान है। अगर बारिश की स्थिति यही रही तो इस साल की बारिश बाढ त्रासदी का रूप अख्तियार कर सकती है।
 कोसी की सहायक नदियां भी उत्पन्न करती है बाढ    
कोसी जहां अभी से ही उफनाने लगी है वहीं कोसी की सभी सहायक नदियों में भी बाढ आ गयी है। जबकि कोसी की सभी सहायक नदियों के लिए सरकार के पास कोई योजना व परियोजना नहीं है। ऐसे सभी सहायक नदियों के पुनर्जीवित व संरक्षण की ज्यादा जरूरत है। इसके संरक्षण से बिहार में सिंचाई, मत्स्य पालन के आलावा जल कृषि के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया जा सकता है।    

कौन-सा क्षेत्र है मध्य हिमालय       

हिमालय के मध्य भाग का क्षेत्रफल एक लाख 16 हजार 800 वर्ग किलो मीटर है और इस मध्य हिमालय क्षेत्र में ही संपूर्ण नेपाल स्थित है। इस मध्य हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने व बारिश के पानी की निकासी पूरब में कोसी, पश्चिम में कर्नाली व मध्य में गंडक नदी के द्वारा होते रही है। मध्य घाटी में ही नेपाल की राजधानी काठमांडु भी अवस्थित है। यहां कई शिखर ऐसे हैं जिनकी उंचाई आठ हजार मीटर है और ऐसे सर्वाधिक ऊँचाई वाले शिखर मध्य हिमालय क्षेत्र में ही पड़ती है। जिसमें धौलागिरी (8172मी.), अन्नपूर्णा (8078मी.), मनासल (8156मी.), गोसाईथान (8013मी.), चोओयू (8153मी.), माउंट एवरेस्ट (8848मी.), मकालू (8481मी.) सहित कांचनजुंगा (8598मी.) भी शामिल है। इसी प्रकार विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट की एकल सरंचना ऐसी है जो 1070 मीटर मोटी एवं चूना पत्थर व अन्य अवसादों के रूपांतरण से ही निर्मित हुई है। ये सभी शिखर सदा हिमच्छादित है और अनेक हिमनदों का भरण भी करती है। नेपाल को दो भागों में विभक्त करने वाली घाटी अवसारी शैल की वंशज पहाड़ियों के कटने से रूपांततरित होकर बनी है। जबकि उत्तर में अभिनत पहाड़ियाँ नेपाल को घेरे हुए है और दक्षिणी भाग उच्चावाच प्रतिलोमन को प्रदर्शित करती है।
 नहीं ढूंढा जा रहा है बाढ का स्थाई समाधान
बाढ का स्थायी समाधान नहीं ढूंढा जा रहा है और सरकार व जनप्रतिनिधि अब भी हाईडैम की पुरानी राग अलापने में लगी है। जबकि कोसी वासियों के लिए हाईडैम बाढ का सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकती है। यह क्षेत्र भूकंप के लिए सबसे अतिसंवेदनशील क्षेत्र है और विगत कई सालों से नेपाल में आ रही भूकंप ने यह साबित कर दिया कि कोसी की बाढ का हाईडैम भी वास्तविक समाधान नहीं रह गया है। नेपाल की काठमांडू और पहाड़ पर सिन्धु नदी ला अटका पनु भी एक सबसे बड़ा उदाहरण है।  



Sunday, July 9, 2017

भामाशाह जयंती पर लांच किये गए ‘भामा-गाथा’



भामाशाह जयंती पर लांच किये गए भामा-गाथा


संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए अखिल भारतीय माहौर वैश्य महासभा के अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता व संस्थापक हरस्वरूप गुप्ता ने राज महाजन को किया सम्मानित

मेघा वर्मा/नई दिल्ली: 471वीं भामाशाह जयंती के मौके पर राज महाजन कृत 'भामा-गाथा' को एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में अखिल भारतीय माहौर वैश्य महासभा के द्वारा विश्व-स्तर पर बड़ी धूम-धाम के साथ प्रकाशित कर दिया गया. इस अवसर पर पब्लिक से भरपूर हाल में अ.भा.मा.वैश्य.महासभा के अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता द्वारा राज महाजन को संगीत माध्यम से समाजहित में योगदान के लिए सम्मान दिया गया. राज महाजन के अग्रज गिरीश गुप्ता भी समारोह में हाज़िर रहे. निर्माता-निर्देशक राज महाजन के भतीजे बॉडी-बिल्डर जोकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए मिस्टर वर्ल्ड के प्रतियोगिता विजेता पारस गुप्ता को भी सम्मानित किया गया. साथ ही भारतीय जनता पार्टी सांसद मिनाक्षी लेखी, प्रसिद्ध बीजेपी नेता श्याम जाजू और दिल्ली के कुछ निगम पार्षद भी उपलब्ध रहे. यह आयोजन 28 जून 2017 को किया गया.

भामा-गाथा म्यूजिक विडियो में महान दानवीर और देशभक्त भामाशाह के बारे में बताया गया है. जब महाराणा प्रताप सिंह हल्दीघाटी की लड़ाई अकबर से हारने के पश्चात जंगलों में रहने लगे थे और घास की रोटी खाने को मजबूर थे. तब, पिता भारमल के पुत्र भामाशाह ने राष्ट्रहित हेतु महाराणा प्रताप को अपना सब-कुछ दान कर दिया. वो इतनी बड़ी धनराशी थी जो महाराणा प्रताप के सैनिकों के लिए 12 वर्ष की तन्खवाह के लिए पर्याप्त थी. साथ ही, राष्ट्रभक्त भामाशाह ने अपने 2 पुत्रों का भी बलिदान भी इस लड़ाई में दे दिया था. राष्ट्रभक्त भामाशाह ने महाराणा प्रताप के साथ मुघलों के खिलाफ लड़ाई में पूरा साथ दिया. तत्पश्चात महाराणा ने लड़ाई विजय करने के के बाद मेवाढ़ का बहुत बड़ा हिस्सा वापिस पाया.
भामा-गाथा का कांसेप्ट, निर्देशन, निर्माण, गीत और संगीत राज महाजन ने स्वयं किया है और आवाज़ दी है गायक नितेश शर्मा ने. साथ ही इस गाने में एक्टिंग में हैं खुद राज महाजन. निर्माता-निर्देशक राज महाजन इस म्यूजिक विडियो में फिर एक बार नए लुक में नज़र आयेंगे.
म्यूजिक कंपोजर राज महाजन ने बताया, “ज़्यादातर लोग महाराणा प्रताप सिंह और हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में तो जानते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग यह जानते हैं कि महाराणा प्रताप के जीतने की वजह दानवीर भामाशाह थे, जिन्होंने राष्ट्रहित की खातिर अपना सब-कुछ महाराणा प्रताप सिंह को दे दिया था और युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर साथ निभाया था. गीत-संगीत एक अच्छा माध्यम है सन्देश देने का. इसलिए मैं भामा-गाथाके माध्यम से सब लोगों को भामाशाह जैसे देशभक्त महापुरुष के त्याग के बारे में बताना चाहता हूँ.
मोक्ष म्यूजिक कंपनी के बैनर तले भामा-गाथाविश्व-स्तर पर प्रकाशित हो चुका है. YouTube, DailyMotion, iTunes, Saavn, Gaana, hungama, Spotify, Deezer, Rhapsody, Soundcloud, Airtel, Vodafone, Idea इत्यादि डिजिटल स्टोर्स पर 256 देशों में यह गाना उपलब्ध हो चुका है.
भामा-गाथा को YouTube पर देखने के लिए लिंक : https://www.youtube.com/watch?v=le_myMBA76


Monday, March 13, 2017

होली में छाया रहा खेसारीलाल यादव का बहिन छीनरा देवरा...वाला गाना

होली में छाया रहा खेसारीलाल यादव का बहिन छीनरा देवरा...वाला गाना
सवाल उठता है क्या इन बच्चों के लिए होली जैसे पर्व में भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिक्षाटन ही एक माध्यम रहा। अगर इन बच्चों के प्रतिभा के अनुकुल संगीत की भी शिक्षा दिया जाता तो शायद बचपन से ही कौशल विकास हो जाता और इससे बड़ा कलाकार कोई नहीं होता...


सहरसा। इस साल होली में अबोध बच्चों की टोली शहर के बाजारों में दुकान-दुकान जाकर बहिन छीनरा देवरा...बैगनवा जीजी होई ना फ्राई...जैसे अश्लील गीतों को झूम-झूमकर गाकर सुनाया और होली का मनोरंजन किया। लोगों ने उस अबोध बच्चों के द्वारा गाये जा रहे गाने के बोल को सुनकर हंसी-ठिठौली तो जरूर किया। लेकिन नाबालिग बच्चों के होंठों की अश्लील शब्दों के उ़च्चारण से वे खुद भी शरमा जा रहे थे। उन बच्चों को लग रहा था कि उनके मुंह से ऐसे गाने नहीं गाया जाना चाहिए। जब उन बच्चों से पुछा गया कि यह गाना किसका गाया हुआ है तो फटाक से बोला कि ये गीत खेसारीलाल यादव के होली 2017 के सुपरहिट गीत है भैया।

बाल कलाकारों की टोली के प्रमुख गौतम कुमार ने बताया कि नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड सं. 19 बस स्टैंड के पीछे के हम सभी रहने वाले हैं और अपने पिता का नाम सिकन्दर मल्ल्कि बताया। इस टोली में संतोष कुमार, मुकेश कुमार, पंकज कुमार, सोनू कुमार आदि बच्चे शामिल थे। गौतम ने अंत में गायक खेसारीलाल यादव के एक गीत जान गईलू ये हो जान गईलू, हाथ नैखे लिखल हाथ के लकीर नैखे तकदीर में...बेहिचक सुनाया। अपनी सुरीली आवाजों से लोगों का खुब मनोरंजन करता रहा। लेकिन सवाल उठता है क्या इन बच्चों के लिए होली जैसे पर्व में भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिक्षाटन ही एक माध्यम रहा। अगर इन बच्चों के प्रतिभा के अनुकुल संगीत की भी शिक्षा दिया जाता तो शायद इससे बड़ा कलाकार कोई नहीं होता।

कोसी क्षेत्र से फिल्म ‘अनारकली ऑफ आरा’ का है गहरा ताल्लुक

कोसी क्षेत्र से फिल्म अनारकली ऑफ आराका है गहरा ताल्लुक

पत्रकारिता के संघर्ष के दिनों में कहिए या मैथिली की कथा गोष्ठी के खातिर अपने अभिन्न मित्र पत्रकार निर्भय झा व युवा समाजकर्मी भगवानजी पाठक के साथ अक्सर वे सहरसा आते रहे हैं। सुपौल के डॉ. शिवेन्द्र दास, केदार कानन एवं सहरसा में स्व.महाप्रकाश व शैलेन्द्र शैली से वे जरूर मिलते थे। कोसी की माटी-पानी से पत्रकार अविनाश को भावनात्मक रिश्ता भी है...

संजय सोनी/सहरसा।
अपनी प्रदर्शन से पूर्व ही कथा, अभिनय व गानों को लेकर चर्चित भोजपुरी फिल्म अनारकली ऑफ आराका गहरा ताल्लुक कोसी क्षेत्र के सहरसा, सुपौल एवं मधेपुरा से भी है। यह फिल्म 24 मार्च को देश स्तर पर प्रदर्शित होने जा रही है। भोजपुरी फिल्म अनारकली ऑफ आराके लेखक व निर्देक एवं बाबा नागार्जन के परम शिष्य अविनाश दास के मित्रों का एक बड़ा कुनबा कोसी क्षेत्र भी रहा है। यही वजह है कि भोजपुरी फिल्म अनारकली ऑफ आराके प्रदर्शन का इंतजार कोसीवासियों को बेशब्री से है।
मुलतः मिथिलांचल की राजधानी दरभंगा निवासी अविनाश दास पत्रकारिता के संघर्ष के दिनों में कहिए या मैथिली की कथा गोष्ठी के खातिर अपने अभिन्न मित्र पत्रकार निर्भय झा व युवा समाजकर्मी भगवानजी पाठक के साथ अक्सर वे सहरसा आते रहे हैं। सुपौल के डॉ. शिवेन्द्र दास, केदार कानन एवं सहरसा में स्व.महाप्रकाश व शैलेन्द्र शैली से वे जरूर मिलते थे। वे प्रभात खबर के लिए लौटकर अविनाश कोसी क्षेत्र की संस्कृति व विभिन्न समस्याओं एवं बाढ व विस्थापन, पलायन जैसे खास रिर्पोटिंग के लिए ही प्रमुख रूप से आते थे। कोसी की माटी-पानी से पत्रकार अविनाश को भावनात्मक रिश्ता भी है। यूं कहा जाय कि सुपौल जिले के कर्णपुर स्थित भाई निर्भय का घर उनका अपना घर हुआ करता था। निर्भय से अविनाश का पारिवारिक संबंध रहा है। इसलिए पत्रकारिता जगत से फिल्म की दुनिया में कदम रखने वाले अविनाश दास की पहली भोजपुरी फिल्म अनारकली ऑफ आरा’ 24 मार्च 2017 को रीलिज होगी तो इन क्षेत्रों के सिनेमा घरों में भी खुब चलेगी। फिल्म अनारकली ऑफ आराके लेखक व निर्देशक अविनाश के लिए बिहार एवं बिहार के अन्य जिलों समेत कोसी प्रमंडल के सहरसा, सुपौल एवं मधेपुरा के लिए परिचय की जरूरत नहीं है। कोसी तटबंध के अंदर के गांवों का नाम आज भी उनकी जुबान पर आसानी से आ जाती है। कोसी की देशी मछली के स्वाद के वे काफी शौकीन हैं।
मशहूर अभिनेत्री स्वरा भास्कर की बेहद खास फिल्म
बॉलीवुड में अपने संजीदा अभिनय के लिये मशहूर स्वरा भास्कर अपनी आने वाली फिल्म अनारकली ऑफ आराको खास फिल्म मानती है। पत्रकारिता की दुनिया से फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने वाले अविनाश दास निर्देशित फिल्म अनारकली ऑफ आरा’ 24 मार्च को प्रदर्शित हो रही है। फिल्म में स्वरा भास्कर, संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी एवं इश्तियाक खान की महत्वपूर्ण भूमिका हैं। फिल्म की कहानी भी अविनाश दास ने लिखी है। रांझना, तनु वेडस मनु, तनु वेडस मनु रिटर्नस, प्रेम रतन धन पायो और निल बटे सन्नाटा में अपनी अदायगी का लोहा मनवा चुकी स्वरा भास्कर फिल्म अनारकली ऑफ आराको बेहद खास मानती है।
फिल्म अनारकली ऑफ़ आरा का पहला गाना 
यह रहा हमारी फिल्म अनारकली ऑफ़ आरा का पहला गाना। दिलों से खेलते हो या कि कोई जंग करते हो- दुनाली लेके सरकारी हमें क्यों तंग करते हो। रामकुमार सिंह के शब्द हैं और इसे सुरों में सजाया है रोहित शर्मा ने। आवाज़ है स्वाति शर्मा की। कोरियोग्राफी है शबीना खान की। दृश्यों में अभिनेताओं का उत्साह आप देख ही रहे हैं। निर्देशक ने भी इस गाना को सुनने व सुनाने के लिए सभी को शेयर करने को कहा है। मतलब दिल की धड़कन तेज है और फिल्म रीलिज होने के साथ ही इस गाने को लोकप्रिय होने से कोई नहीं रोक सकता। 

फेसबुक की टाईम लाईन पर अविनाश की बात   


स्कूल में थे, तो कविता लिखने का शौक चढ़ा। मेरा सहपाठी था विनय भरत। हमदोनों स्कूल की छुट्टी के बाद अपनी कविताएं बस्ते में लेकर साइकिल से प्रभात खबर के दफ्तर (कोकर इंडस्ट्रियल एरिया,रांची) जाते थे। तब दरबान रोकता नहीं था। हम हरिवंश जी से मिलते थे, जो प्रभात खबर के प्रधान संपादक थे। आज वो राज्यसभा सांसद हैं। आपको कुछ कुछ याद होगा घनश्याम भैया, क्योंकि हमदोनों को सदेह आपके पास ही फारवार्ड कर दिया जाता था। उन्हीं दिनों श्रीनिवास जी, से भी दोस्ती हो गयी थी। उन्हीं दिनों कार्टून बनाते हुए मनोज भैया, भी मिल जाते थे। बाद में मैं दरभंगा होते हुए पटना आ गया। सात अप्रैल 96 से प्रभात खबर का पटना संस्करण छपना शुरू हुआ। मेरे कुछ परिचित उसमें लग गये। मैं चूंकि बहुत कच्चा था, तो मैंने कोशिश ही नहीं की। लेकिन अप्रैल बीतते बीतते रहा नहीं गया और मैं एसपी वर्मा रोड में समृद्धि अपार्टमेंट के छठे माले पर सीढ़ियां चढ़ते हुए पहुंच गया। वहीं प्रभात खबर का आॅफिस था। दरबान को मैंने हरिवंश जी के नाम एक परची पकड़ायी, ये लिख कर कि आदरणीय हरिवंश जी, आपको याद हो न हो, स्कूल के दिनों में एक लड़का अपनी कविताएं लेकर आपसे मिला करता था। हरिवंश जी दरवाजे पर आकर मुझे अपने केबिन में ले गये। खूब सारी बातें की। कहा कि प्रभात खबर से जुड़ जाओ-पत्रकारिता सीखो। तो दो मई 96 को मैंने प्रभात खबर ज्वाइन किया और फिर यही अखबार पत्रकारिता की मेरी पाठशाला बन गया। 

Saturday, March 11, 2017

होली पर्व से जुड़ी पूर्णिया का ऐतिहासिक स्थल सिकलीगढ़ किला

होली पर्व से जुड़ी पूर्णिया का ऐतिहासिक स्थल सिकलीगढ़ किला

  • सिकलीगढ़ किला बनमनखी के धरहरा में है अवस्थित
  • हिरण्यकाश्यप का नरसिंग अवतार का खंभा अब भी यादों को रहा ताजा

क्षितिज कुमार/पूर्णिया 
देश में जहां जायें आपको चैक-चैराहांे पर मंदिर बना हुआ मिल जायेंगे। अगर पूर्णिया की ही बात करें तो यहाँ भी सैकड़ो की संख्या में मंदिर है। जिसमें एक ऐसा भी मंदिर है जिसका अपना एक ऐतिहासिक महत्व व तथ्य भी है। इतना ही नहीं हिन्दू धर्म के आस्था से भी जुड़ा हुआ है। जिसकी परवाह न पूर्णिया वासियों को है और न ही बिहार सरकार को। जी हाँ, हम बात कर रहे है बनमनखी प्रखंड के धरहरा स्थित सिकलीगढ़ किला का। जहाँ भगवान विष्णु ने नरसिंग अवतार लेकर हिरण्यकाश्यप का वध किया था। प्राचीन कथा के अनुसार होलिका के मरने के बाद होली त्यौहार की शुरुआत हुई थी। बनमनखी के धरहरा में आज भी वह खंभा मौजूद है। जिसे फाड़ कर नरसिंग भगवान ने अवतार लिया एवं हिरण्यकाश्यप का वध भी किया। आज यह जगह जीर्णशीर्ण अवस्था में पड़ा हुआ है। इस जगह को आज तक बिहार सरकार पर्यटन स्थल भी घोषित नहीं कर पायी है। हालांकि यह स्थल पहले से बेहतर जरूर हुआ है। इस क्षेत्र को लोग श्रीहरि नरसिंग अवतार स्थल, प्रह्लाद नगर, सिकलीगढ़ धरहरा,बनमनखी (पूर्णिया) के रूप में जानते हैं।  
जाने कैसे हुआ मंदिर का कायाकल्प 

बनमनखी प्रखंड के ही कुछ लोगों ने इस ऐतिहासिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया है। हरेक साल होली में यहाँ होलिका दहन का विशेष आयोजन किया जाता है। जिसे देखने के लिए देश-विदेश से षैलानी आते है। लोगो का जज्बा देख कर तत्कालीन अनुमंडला पदाधिकारी डॉ.मनोज कुमार ने ग्रामीणों का साथ दिया और सभी के अथक प्रयास से भगवान विष्णु का एक भव्य मंदिर बना। जिस खम्बे से भगवान ने नरसिंग के रूप में अवतार लिए उस जगह की घेराबंदी कर खम्बा को सुरक्षित रखा गया है। यहाँ के कोषाध्यक्ष का कहना है की इस धरोहर को बचाने के लिए विधायक से लेकर सांसद तक और पर्यटन मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक अनुरोध किया गया। मगर आजतक आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है। इस स्थल को प्र्यटन स्थल की सूची में दर्ज कर लिया जाता तो षायद इस क्षेत्र की तस्वीर बदली होती।
भक्त प्रलाद को लेकर सम्मत पर बैठी थी होलिका
हिन्दू पंचांग के अंतिम मास फाल्गुन की पूर्णिमा को होली का त्योहार मनाया जाता है। होली का त्योहार मनाए जाने के पीछ कई कथाएं प्रचलित हैं। होली की सबसे प्रमुख कथा में राजा हिरण्यकश्यप को राक्षसों का राजा कहा गया है। उसका एक पुत्र था जिसका नाम प्रह्लाद था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था। जब उसे पता चला कि प्रह्लाद विष्णु का भक्त है तो उसने प्रह्लाद को रोकने का काफी प्रयास किया। लेकिन तब भी प्रह्लाद की भगवान विष्णु की भक्ति कम नहीं हुई। यह देखकर हिरण्यकश्यप प्रह्लाद को यातनाएं देने लगा। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को पहाड़ से नीचे गिराया,हाथी के पैरों से कुचलने की कोशिश कीकिंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, होलिका।
उसे वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका के वरदान का सहारा लिया। होलिका प्रह्लाद को गोद में बैठाकर आग में प्रवेश कर गयी, फिर भी भगवान विष्णु की कृपा से तब भी भक्त प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रूप में होली का त्योहार मनाये जाने लगा।
नरसिंग अवतार ने ही किया था हिरण्यकाश्यप का वध
हिरण्यकाश्यप एक अहंकारी असुर था जिसकी कथा पुराणों में आती है। उसका वध नृसिंह अवतारी विष्णु द्वारा किया गया। हिरण्याक्ष उसका छोटा भाई था जिसका वध बराह ने किया था। विष्णु पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के आदिपुरुष काश्यप व उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए। हिरण्यकाश्यप और हिरण्याक्ष। हिरण्यकाश्यप ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में और न ही रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें व पूजा करे। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। भगवान विष्णु का हिरण्यकाश्यप का पुत्र प्रह्लाद घोर उपासक था और पिता के यातना व प्रताड़ना के बाद भी वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकाश्यप् ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ पर होलिका जलकर राख हो गई। अंतिम प्रयास में हिरण्यकाश्यप ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए। वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकाश्यप को महल के प्रवेश द्वार की चैखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज नाखूनों से जो न अस्त्र था न शस्त्र, मार डाला। इस प्रकार हिरण्यकाश्यप अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ। जिस खम्बे से भगवान ने अवतार लिया वह खम्बा आज भी पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के धरहरा में विद्यमान है।