Wednesday, November 18, 2020

 भाई-बहन के अापार स्नेह का पर्व भ्रातृद्वितीया के गीतों से सराबोर रहा मिथिलांचल क्षेत्र 

  • बहनों ने उपवास रहकर व्रत की और भाईयों को बजरी खिलाकर की लंबी उम्र की कामना 

सहरसा/संजय सोनी 

भ्रातृद्वितीया पर्व की महत्ता बढती ही जा रही है। कोरोना संक्रमणकाल में बहनों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सोशल डिस्टेंस को नजरअंदाज करते हुए भाइयों की लंबी उम्र की कामना वाली लोक पर्व भ्रातृ द्वितीया मनायी। अब शहरी क्षेत्र के घर-आंगन मेंं भी लड़किया एवं महिलाएं इस व्रत को खुब कर रही है। कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की द्वतिया को भाई एवं बहन के अापार स्नेह का महान पर्व भ्रातृद्वितीया(भैया दूज) के गीतों से मिथिलांचल क्षेत्र सराबोर रहा।

भाईयों को बजरी खिलाकर की लंबी उम्र की कामना- 

सोमवार 16 नवंबर को बहनों ने उपवास रहकर व्रत की और अपने-अपने भाईयों को बजरी खिलाकर लंबी उम्र कामना की। हिन्दु परिवारों में कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को

बहना उपवास रहकर अहले सुबह से ही भईया दूज की तैयारी में जुट गयी। भैया दूज मनाने के लिए अपने-अपने मुहल्ले के जानकार वृद्ध महिला के घर गोबर से लिप कर पूजन स्थल बनायी।  पूजन स्थल के चारों तरफ महिला एवं लड़कियों ने यमुना एवं यमराज का प्रतीक रूप बनाकर गीत गाकर पूजा-अर्चना की। इसके बाद अपने-अपने भाईयों को बजरी खिलाकर दीर्घायु जीवन की कामना की। अर्पण से सजा बीच आंगन में आसन पर भाई को बैठाकर भाइयों को माथे पर तिलक लगाकर आरती की और कलाई में रक्षासूत्र कलेवा बांधकर दीर्घायु जीवन की कामना की। इसके बाद केला में बजरी डाल कर प्रसाद ग्रहण करवायी।

वृद्ध महिलाओं ने सुनायी भैया दूज की कथा-

वृद्ध महिलाओं ने भैया दूज की कथा सुनाई। कथा के दौरान पौराणिक मान्यताओं से अवगत कराती हुए  मैया यमुना नदी ने अपने भाई यमराज को इसी दिन मांगलिक द्रव्यों का टीका लगाकर भोजन ग्रहण करवायी थी। इसके बाद भाई यमराज ने अपनी बहन यमुना से वरदान मांगने की इच्छा व्यक्त की तो वरदान में बहना ने कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया को जो भी नदी स्नान करेगा उसे अंत काल में यम यातना नहीं भोगना पड़ेगा की मांगी। भाई यमराज ने इसी दिन से अपनी प्यारी बहन यमुना को वरदान देकर परलोक सिधार गये। उस दिन से ही इस पर्व को बहन एवं भाई अंगीकार कर कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को भ्रातृ द्वितीया मनाने लगी।


Sunday, November 15, 2020

चैनपुर पंचायत में वर्ष 1915 में स्थापित पाठशाला 
चैनपुर पंचायत में वर्ष 1915 में स्थापित इस पाठशाला में बच्चों को वैदिक शिक्षा की प्रमुख शिक्षण संस्थान सरकारी सुविधा से वंचित, बच्चों को यहां यजुर्वेद का प्रमुख अंग रूद्राष्टाध्यायी की दी जाती है शिक्षा 



बाल्यकाल से ही यजुर्वेद की शिक्षा प्रदान करने वाली कोसी क्षेत्र की एक मात्र प्राचीन संस्कृत शिक्षा पद्धति पर आधारित टोल संस्कृत पाठशाला आज भी सरकारी सुविधा से वंचित है। जिले के कहरा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत चैनपुर पंचायत अवस्थित वर्ष 1915 में स्थापित इस पाठशाला में बच्चों को यजुर्वेद का प्रमुख अंग रूद्राष्टाध्यायी का न केवल पाठ कराया जाता है बल्कि दो साल के अंदर बच्चों को आवासीय शिक्षण व प्रशिक्षण देकर कंठस्थ करा दिया जाता है। इस शिक्षा को ग्रहण करने वाले छात्र वैदिक रीति-रिवाज से पूजा-पाठ को दक्षता प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन आधुनिक शिक्षा पद्धति के समक्ष इस प्राचीन संस्कृत शिक्षा पद्धति पर आधारित विद्यालय के विकास की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। 
जिले के कहरा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत चैनपुर पंचायत के पूबारी टोल के वार्ड सं. 4 अवस्थित श्री भागीरथ प्राथमिक सह माध्यमिक संस्कृत पाठशाला प्राचीनकाल में टोल संस्कृत पाठशाला के नाम से प्रचलित थी। इसके बाद वर्ष 1941 में जब यहां संस्कृत के साथ अन्य विषयों की शिक्षा दी जाने लगी तो भागीरथ संस्कृत प्राथमिक विद्यालय और फिर 1972 में पूरी तरह से आधुनिक शिक्षा पद्धति को अपना लिया ता यह श्री भागीरथ प्राथमिक सह माध्यमिक संस्कृत पाठशाला के रूप में मान्यता प्राप्त कर ली। इस विद्यालय में छोटे-छोटे बच्चों को आवासीय शिक्षण के तहत शास्त्रीय व उपशास्त्रीय के आलावा लघु सिद्धांत कौमुदी, रूद्राष्टाध्यायी, मूल रामायाणम् एवं  रघुवंश रूचि सर्वग जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पढाई होती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण व जीवनोपयोगी विषय रूद्राष्टाध्यायी है। रूद्राष्टाध्यायी में अभिषेक विधि एवं पूजा विधान की विस्तार से वर्णन है। इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक उमेश कुमार झा ने कहा कि रुद्राष्टाध्यायी यजुर्वेद का प्रमुख अंग है और वेदों को ही सर्वोत्तम ग्रंथ बताया गया है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में वेदों का इतना महत्व है व इनके ही श्लोकों, सूक्तों से पूजा, यज्ञ, अभिषेक आदि किया जाता है। उन्होंने कहा कि सरकारी सुविधा नहीं मिलने की वजह से विद्यालय विकास बाधित है। 

इस विद्यालय के विभिन्न कक्षाओं में कुल 150 बच्चे जहां नामांकित हैं वहीं 14 बच्चे आवासीय शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। आवासीय शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र ही मूल रूप से रूद्राष्टाध्यायी का अध्ययन करते हैं और जीवनोपयोगी बना रहे हैं। इस विद्यालय को भवन का घोर अभाव है। इस वजह से नामांकित बच्चों की दैनिक उपस्थिति भी कमजोर पड़ जाती है। इस विद्यालय में प्रधानाध्यापक उमेश कुमार झा सहित कुल 9 शिक्षक पदस्थापित हैं और इनमें कोई व्याकरणाचार्य, साहित्याचार्य तो कोई वेदाचार्य हैं। पढाई की गुणवत्ता वेदों की पढाई कर रहे बच्चों की प्रतिभा से ही प्रलक्षित हो जाती है।

चैनपुर मां काली के पिंडी दर्शन व पूजा कर सालों भर श्रद्धालु आध्यात्मिक उर्जा से होते हैं अभिभूत

 






-आदि काली मंदिर के पिंडी में भी बसती है कोलकाता के मां दक्षिणेश्वर काली की आत्मा


सहरसा, संजय सोनी

पश्चिम बंगाल कोलकाता के मां दक्षिणेश्वर काली की आत्मा सहरसा जिला के कहरा प्रखंड अंतर्गत चैनपुर गांव स्थित आदि काली मंदिर के पिंडी में भी बसती है। चैनपुर गांव में काली पूजा की करीब 150 साल पुराना इतिहास एवं परंपरा है। चैनपुर मां काली मंदिर में श्रद्धालुओं को कोलकाता दक्षिणेश्वर मां काली की आभा महसूस होती है। यहां सालों भर भक्त एवं श्रद्धालुगण मां काली की पिंडी दर्शन व पूजा कर आध्यात्मिक उर्जा से अभिभूत होते रहते हैं। मां काली के जन्म के साथ ही भक्ति भाव से पूजा-अर्चना में श्रद्धालु जुट जाते हैं। मां काली पूजा एवं छागर बलि प्रदान की भी अद्भूत परंपरा है और प्रत्येक साल परंपरा के अनुरूप वैदिक रीति-रिवाज से काली पूजा-अराधना की जाती है। जन्म के दूसरे दिन मेला और तीसरे दिन ग्राम भ्रमण कर श्रद्धाभाव से मूर्ति विसर्जन किया जाता है।    

श्रीश्री 108 श्रीनीलकंठ काली पूजा समिति चैनपुर-

इस गांव में एक अन्य स्थान पर श्रीश्री 108 श्री नीलकंठ काली पूजा समिति चैनपुर द्वारा वर्ष 1972 में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की गयी। यहां 49 वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। यहां भी मूर्तिकार संजय खां पिछले 30 वर्षों से मूर्ति बनाते आ रहे हैं।

 

चैनपुर में काली पूजा की कैसे बनी परंपरा-

वर्ष 1870 में चैनपुर गांव निवासी साधक सिंहेश्वर दत्त ठाकुर द्वारा पछवारी टोला में कोलकाता के मां दक्षिणेश्वर काली मंदिर की पिंडी की मिट्‌टी से प्राण-प्रतिष्ठा की गयी थी। महामहोपाध्याय पं. अमृतनाथ झा द्वारा पूजा पद्धति बनाकर विधिवत पूजा-अराधना प्रारंभ किया गया। ग्रामीण कहते हैं कि दक्षिणेश्वर काली कोलकाता में भी 1847 में मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था।  

मूर्ति निर्माण की भी है पुश्तैनी परंपरा-                       

चैनपुर आदि काली (बुढिया काली) मंदिर के प्रथम मूर्तिकार चैनपुर के भायलाल झा हुए और इसके बाद से ही मधुबनी जिला के मधेपुर गांव निवासी बतहु पंडित ने बनाना शुरू किया। उसके बाद उनके वंशजों में पुत्र शिवजी पंडित, उसके बाद फिर पुत्र रामप्रसाद पंडित द्वारा आकर्षक एवं कलात्मक मूर्ति बनायी जाती रही है। इस साल मूर्तिकार रामप्रसाद पंडित मुर्ति बना रहे हैं।

सौहार्दपूर्ण वातावरण में पूजा एवं मेला आयेजन की जिम्मेवारी-

वर्ष 2020 में 150 वां पूजा एवं मेला का आयोजन किया जा रहा है। वर्ष 2020 में श्रीआदि काली पूजा समिति के अध्यक्ष सोनू कुमार ठाकुर, उपाध्यक्ष राजु ठाकुर, सचिव सुंदरकांत ठाकुर, उप सचिव रतीश कुमार झा एवं कोषाध्यक्ष दिनेश कुमार झा काे ग्रामीणों ने सौहार्दपूर्ण वातावरण में पूजा एवं मेला आयेजन की जिम्मेवारी सौंपी गयी है।

Tuesday, October 29, 2019

मखाना एवं धान की खेती से वंचित जमीन में व्यापक पैमाने पर किया जा सकता है सिंघारा की खेती

कोसी में सिंघारा उत्पादन की आपार संभावना के बाद भी कृषि विभाग के महत्वांकाक्षी योजना की सूची से वंचित 

  • कम लागत में सिंघारा की खेती कर किसान हो सकते हैं आर्थिक रूप से समृद्ध 
  • जलीय फल सिंघारा में भैंस की दूध से 22 % अधिक है मिनिरल्स  
  • चपरांव गांव में सिंघारा की खेती करते किसान  
  • चपरांव में उप्तादित सिंघारा की बिक्री करती महिला  
पानी फल सिंघारा 




सहरसा, संजय सोनी 


कोसी क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में जलीय फल सिंघारा उत्पादन की आपार संभावनाएं रहने के बाद भी कृषि विभागअपनी महत्वाकांक्षी योजना में सिंघारा उत्पादन को शामिल नहीं कर रही है। जबकि प्रत्येक साला हजारों हेक्टेयर जमीन पानी के अभाव में मखाना एवं धान की खेती वाली जमीन वंचित रह जाती है। वैसे खेतों में कृषि विभाग एवं किसान आसानी पूर्वक सिंघारा की खेती की योजना तैयार कर बेकार पड़ी जमीन से सिंघारा के रूप में सोना उपजा सकती है। सिंघारा उत्पादन के लिए कृषि वैज्ञानिक एवं उद्यान पदाधिकारी भी कोसी क्षेत्र के ईलाके को उत्तम मानते हैं। लेकिन कोसी के ईलाकों में सिंघारा की खेती औने-पौने तरीके से की जा है। सिमरीबख्तियारपुर प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में होती है सिंघारा की खेती-
सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के चपरांव सहित आसपास के क्षेत्र में करीब 50 एकड़ जलीय खेत में सिंघारा की खेती सदियों से की जाती रही है। चपरांव के किसान मो. गफुर, मो. अनू, मो. आसिन आदि करते हैं। अंतिम बैशाख एवं ज्येष्ठ से सिंधारा की खेती शुरू कर देते हैं और कार्तिक माह से फसल तोड़ना शुरू हो जाता है।

कितनी जमीन में होती है कितनी उपज-  
सब कुछ ठीक रहने पर एक कठ्‌ठा जमीन में 40 किलो सिंघारा का उत्पादन होता है। लेकिन डूबे परिस्थिति में भी एक कठ्‌ठा में 20 से 30 किलो फसल होना ही होना है। बीज की तैयारी के लिए फसल बचाकर किसान रखते हैं और उसका बीचरा यानि गुंज तैयार कर जलीय खेत में डाल देते हैं। गुंज जैसे जैसे बढता है उसी को तोड़कर पुन: खेत में डालने से फसल का विस्तार हाते जाता है। एक बीघा में 5 किलो बीज लगता है। मजदूर भी 500 रूपए रोज के हिसाब से मजदूरी लिया करता है। मजदूर से सिर्फ दवा की छिड़काव एवं सिंघारा तोड़ने के लिए ही की किया जाता है। सिंघारा का थोक रेट 2000 से 3000 रूपए क्विंटल है और खुदरा मूल्य 40 रूपए प्रति किलो की दर से बिक्री होती है।
गरीब किसान बटाई पर करते हैं सिंघारा की खेती-
किसानों को जल-जमाव वाली जमीन 25 हजार रूपए बीघा की दर से खेती के लिए बटाई पर उपलब्ध हो जाती है। किसानों को सिंघारा पौधा (गुंज) 10 रूपए में 3 मिलता है। वह भी सिंघारा उत्पादन करने वाले किसान ही बिक्री करते हैं।             

सिंघारा में भैंस की दूध से  22 % अधिक मिनिरल्स- 
भैंस की दूध से 22 % अधिक मिनिरल्स वाला जलीय फल सिंघारा उत्पादन की कोसी क्षेत्र में आपार संभावनाएं रहने के बाद भी कृषि विभाग अपनी महत्वाकांक्षी योजना में शामिल नहीं कर रही है। जबकि इस जलीय फल सिंघारा में प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेड की मात्रा अधिक होने का दावा आयुर्वेद में की गयी है। सिंघारा में  कार्बोहाईड्रेड की मात्रा अधिक होती है और 100 ग्राम खाने के साथ ही शरीर को 115 कैलोरी मिलती है। 
मखाना एवं धान की खेती से वंचित जमीन में आसानी से होगी खेती-  
 अप्रैल एवं मई महीने में बहुत-सी जमीन पानी के अभाव में मखाना एवं धान की खेती से वंचित रह जाती है। वैसे जमीन में जुलाई से नवंबर तक पानी भरा रहता है। जिसमें व्यापक पैमाने पर सिंघारा की खेती कर किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं और पानी फल सिंघारा की डिमांड भी कम नहीं है। साउथ बिहार में नेचूरल फार्मिंग खुब होती है। नेचूरल कंडीशन में सिंघारा की खेती आसानी से होगी। इसमें बहुत उर्वरक की जरूरत नहीं पड़ती है।
-बिमलेश पाण्डेय, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्र, अगवानपुर, सहरसा। 
जलीय कृषि की आपार संभावनाए हैं- 
जलीय कृषि की अापार संभावनाएं है। जल-जमाव वाले जमीन में कम लागत में सिंघारा की अच्छी खेती किया जा सकता है। सिंघारा को भी योजना में शामिल किया जाना चाहिए।
-संतोष कुमार सुमन, जिला उद्यान पदाधिकारी, सहरसा 
  

Tuesday, October 22, 2019

शौक के पिंजड़े में कैद हो रहा तोता, आखिर कैसे होगा तोता हीरामन मुक्त

शौक के पिंजड़े में कैद हो रहा तोता, आखिर कैसे होगा तोता हीरामन मुक्त

-बाग-बगीचा एवं जंगलों से बहेलिया शिकार कर पहुंचाते हैं शौकियों के पिंजड़े तक 
-अक्सर धान के सीजन में बहेलिया प्रजनन करने वाले वयस्क तोता को -जाल में फांस कर शहर के बाजारों में घूमघूमकर खोमचा में करते बिक्री -रेड स्पोटेड तोता प्रतिबंधित ट्रेड के साथ-साथ जाल में फंसाना कानून अपराध 
-शिडयूल फोर में 7 साल की सजा एवं 10 हजार रूपए जुमाना का है प्रावधान


संजय सोनी/सहरसा 

पिंजड़े में ताेता पालने वालों की तायदाद दिन-प्रतिदिन बढते ही जा रही है और खुले आसमान और बाग-बगीचे में विचरण करने वाला तोता को पिंजड़े में कैद कर दिया जाता है। इस कारण तोता पक्षी की भी आबादी धीरे-धीरे कम होते जा रही है। जबकि तोता का प्रजननकाल माह फरवरी से अप्रैल के बीच होता है। प्रजनन के बाद से ही बहेलिया बाग-बगीचा एवं जंगलों में शिकार कर शौकियों के पिंजड़े तक पहुंचा देते हैं। तोता पक्षी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 में शामिल नहीं किए जाने को लेकर इसके अच्छे प्रजातियों की व्यापक पैमाने पर तस्करी का भी धंधा जोरों पर चलता है। 
सड़क किनारे एवं खोमचा में खुलेआम बिकता है तोता- 
अक्सर धान के सीजन में बहेलिया प्रजनन करने वाले वयस्क तोता को जाल में फांस कर शहर के बाजारों में घूमघूमकर खोमचा में तोता बिक्री करने लगे हैं। 
वैसे सड़क किनारे से लेकर खोमचा तक तोता की बिक्री अमूमन सालों भर की जाती है। तोता बिक्री करने वाले को क्या पता की अब यह तोता पक्षी भी कुछ दिनों बाद अनजान हो जाएगी। तोता के साथ भी अन्याय होने लगी है। पहला घरेलू एवं पालतू पक्षी होने की वजह से तोता भी विलुप्ति के कगार पर जल्द हीं पहुंचने वाली है। इसका मुख्य कारण यह है की पर्यावरणविदों के नजरो में इसकी सुरक्षा की कोई चिंता नहीं रह गयी है। कोसी क्षेत्र के इलाकों में व्यापक पैमाने पर धान की खेती होती है। इस वजह से इन इलाकों में तोते की खासकर छोटे प्रजातियां खूब पायी जाती है। 
कोसी एवं नेपाल के तराई क्षेत्रों में तोता की प्रजाति- 
कोसी एवं नेपाल के तराई क्षेत्रों में मदन बेला, काग बेला,गरार, टिया, काश्मिरी, हीरामन छोटकी, हीरामन पहाड़ी, सुद्दी एवं करणा आदि अधिक पायी जाती है। इन प्रजातियों में सबसे लोकप्रिय हीरामन पहाड़ी है। इस कारण बहेलिया आसानी पूर्वक इसका शिकार कर बाज़ारों में खुलेआम बिक्री करते हैं। न कोई प्रतिबंध और न कोई कानूनी खतरा। लिहाजा धड़ल्ले से तोते की शिकार एवं बिक्री हो रही है। बेचने वालों को क्या मतलब खरीददार पाल सकेगा या नहीं। इस दिशा में वन्य एवं पक्षी प्रेमियों को ख्याल रखने की सख्त जरुरत है, अन्यथा अन्य पक्षियों की तरह तोता भी विलुप्त पक्षी की श्रेणी में आ जाएगी और हमारा समाज चर्चित गीत इक डाल पे तोता बोले और इक डाल पे मैना बोलो हैना गाते ही रह जाएंगे। 
तोते का ट्रेड एवं जाल में फंसाना प्रतिबंधित- 
देश में 5 प्रकार का तोता पाया जाता है। जिसमें कोसी के ईलाके में सर्वाधिक रूप से रेड स्पोटेड तोता पाया जाता है। इन तोता का प्रतिबंधित ट्रेड के साथ-साथ जाल में फंसाना कानून अपराध है। शिडयूल फोर 7 साल की सजा एवं 10 हजार रूपए जुमाना का प्रावधान है। वन विभाग इसके लिए टीम गठित कर तोता का ट्रेड करने और जाल में फंसाने वालों के विरूद्ध सख्त कार्रवाई करेगी। 
-शशिभूषण झा, डीएफओ, सहरसा।

Saturday, March 30, 2019

अहले सुबह से मारवाड़ी समाज के घर एवं आंगन में गुंज रही ""गणगौर'' के गीत

चैत सुदी तीज को सूर्यास्त से पहले पांचों मूर्तियों को तालाब में किया जाएगा विसर्जन


नव कन्याओं के पति हंसी-खुशी नवेली दुल्हन को ससुराल ले जाएंगे विदाई 
"गोर ए गणगोर माता, खोल किवाड़ी। बाहेर उठी पुजावो सईंया, क्या फल मांगा''
सहरसा
मारवाड़ी नव कन्याओं का लोकपर्व गणगौर के गीतों से घर एवं पड़ोस का आंगन कई दिनों से सराबोर है। शहर के विभिन्न मुहल्लों में निर्वासित मारवाड़ी समाज के घर एवं आंगन में अहले सुबह से ही  गणगौर ""हरिये गोबर गीली दाबो, मोत्यां चोक पुरावो। मात्यां का दोय आखा ल्यावो निरणी गोर पुजावो।। गोर ए गणगोर माता, खोल किवाड़ी। बाहेर उठी पुजावो सईंया, क्या फल मांगा।'' गीत के बोल से गुंजायमान रहती है। गणगौर महापर्व में कुंवारी कन्यां अच्छे वर एवं नवकन्याएं ईशर, गोरा, मालन, रोवा एवं कानीराम की अराधना कर पति के दीर्घायू की कामना करती है। अंतिम दिन चैत सुदी तीज को सूर्यास्त से पहले नव कन्याएं, घर की महिलाएं, बच्चियां एवं बच्चे तालाब में पांचों मूर्तियों को विसर्जन करती है। इसके साथ ही अंतिम दिन नव कन्याओं के पति अपने ससुराल से हंसी-खुशी नवेली वधु को विदाई कर ले जाते हैं। 

कब से शुरू हुई गणगौर पूजन-
होलिका में जले बरकुला की राख एवं गाय की गोबर से 8 पिंडीय बनाकर कुंवारी व नवकन्यांए पहली चैत बदी  के दिन से गणगौर की पूजा-अर्चना शुरू करती है। इतना ही नहीं लड़कियां कुम्हार के घर जाकर मिट्‌टी लाती है और उससे भगवान शिव की प्रतिरूप ईशर, मां पार्वती के रूप गोरा, फुलवती के रूप में मालन, ईशर के बहन के रूप रोवा एवं भाई के रूप में कानीराम की मूर्ति बनाकर पूजती हैं।
गणगौर में भाई का महत्व-
गणगौर पूजा में भाई का रक्षा बंधन की तरह ही बड़ा महत्व दिया गया है। बहना भाई को भी तिलक लगाती है और भाई भी सामर्थ्य के अनुरूप बहनों को दान करती है। जिसे गौर बिन्घौरा कहा जाता है। इस परंपरा का निर्वहन मूर्ति बनाने से विसर्जन के बीच की जाती है। इस बीच गुरूवार अष्टमी को शीतला मैया की भी पूजा-अर्चना की गयी। शीतला पूजन में मारवाड़ी समाज के महिला व पुरूष सहित परिवार के सभी सदस्य मां शीतला को जल चढाकर ठंडा खाना खाए और माता को बाजरे की रोटी, राबड़ी, गुलगुल्ला आदि मिष्ठान चढाकर बसिया पर्व के रोज से ही गणगौर की मूर्ति बनाने में भी जुट गयी। 
गणगौर को पिलाती है 16 कुंआ का जल-
मूर्ति बनने के बाद लड़कियां दोपहर में गणगौर को पानी पिलाती है और गणगौर गीत भी गाती है। यह पूजा 17 से 18 दिनों की होती है। अंतिम दिन सुहागिन महिलाएं भी गणगौर को पूजती हैं। नवकन्याएं दोपहर में 16 कुंआ से जल लाकर गणगौर को पिलाती हैं। पूजा-अर्चना में सुनिधी यादुका टेकरीवाल,श्रुति यादुका टेकरीवाल, नेहा अग्रवाल, कोमल केडिया अग्रवाल, मेघा अग्रवाल गुप्ता, काजल अग्रवाल, पलक सुलतानियां, सोनी, दीपिका दहलान, प्रिया दहलान एवं सानू जगनानी इस वर्ष प्रमुख रूप से गणगौर पूज रही हैं।
गणगौर का विसर्जन समय-
तृतीया तिथि 7 अप्रैल को 4 बजे संध्या से शुरू होकर 8 अप्रैल को 4 बजकर 15 मिनट संध्या में नव कन्याओं का महापर्व गणगौर व्रत खत्म होगी। 

      






Sunday, March 17, 2019

बरियाही बाजार में होली मिलन समारोह आयोजित

बरियाही बाजार में होली मिलन समारोह आयोजित


संजय सिंह/सहरसा

जिला के कहरा प्रखंड अंतर्गत बारियाही बाजार स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में वैश्य समाज बारियाही द्वारा होली मिलन अध्यक्ष राजू केशरी बबूल की अध्यक्षता एवं राजेश गुप्ता के संचालन में किया गया। आगत अतिथियों का स्वागत सचिव मनोज साह एवं धन्यवाद ज्ञापन उपाध्यक्ष मनोज सोनी ने किया।
वैश्य समाज बारियाही के होली मिलन समारोह का विधिवत शुभारंभ वैश्य समाज के जिलाध्यक्ष मोहन प्रसाद साह ,कार्यकारी अध्यक्ष देवेन्द्र कुमार देव , जिला प्रवक्ता राजीव रंजन साह , विजय गुप्ता , बजरंग गुप्ता , सत्यनारयाण साह , रंजीत बबलू, अमोद साह, शशि सोनी ,नवीन ठाकुर एवं नीरज राम ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इस होली मिलन समारोह को संबोधित करते हुए वैश्य समाज सहरसा के जिलाध्यक्ष मोहन प्रसाद साह ने कहा होली का त्यौहार समाजिक सौहार्द का त्यौहार है। वैश्य समाज ने आज अपने इस होली मिलन समारोह में समाज के हर वर्ग के लोगों के साथ मिलकर समाज मे समरसता लाने का मिसाल कायम किया है ।

रंग और गुलला का यह त्यौहार आप सभी लिए खुशियों का त्यौहार बने यही हम और हमारी संगठन की कामना है। समारोह में पंकज गुप्ता , अमर रंजन अधिवक्ता , शिशूपाल गुप्ता , प्रदीप गुप्ता, श्याम बिहारी, पप्पू गुप्ता, राजू गुप्ता ,सुनील भगत ,गौरव केशरी ,बबूल पौदार के जिला पार्षद धीरेंद्र यादव आदि ने होली मिलन समारोह में प्रमुख रूप से मौजूद थे।

संत लक्ष्मीनाथ गोसाई की नगरी बनगांव में नशामुक्त होली मनाने की आज भी कायम है परंपरा



बनगांव में तीन दिनों तक शास्त्रीय एवं सुगम संगीत सहित नटुआ नाच से सजती है महफिल
संजय सिंह/सहरसा
एक बेरि फागुन, अाई मिलो पिया, जीवन है जग थोरी। लक्ष्मीपति पछतात राधिका, जो बिधि अंक लिखेरी। जाके कर्म घटे फागुन में, ताके बिछुड़ गये जोड़ी...होरी होय, संत लक्ष्मीनाथ गोसाई के इस चौपाई को लोग गाकर होली के रंग से सराबोर रहते हैं। मान्यता है कि मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण की लठमार होली तो बनगांव में घुमौर होली की अपनी एक अलग संस्कृति है। 18 वीं सदी के महान संत लक्ष्मीनाथ गोसाई कर्म स्थली बनगांव में भगवान श्रीकृष्ण की तरह बिना राग-द्वेष के हिन्दु एवं मुस्लिम के साथ घुमौर होली मनाना शुरू किये। होली के अवसर पर बनगांव में आज भी लोक संगीत एवं शास्त्रीय संगीत से लेकर विदेशिया शैली के संगीत व नृत्य की महफिल सजती है।

आखिर बनगांव की घुमौर होली है क्या-
18 वी सदी के महान संत लक्ष्मीनाथ गोसाई की नगरी बनगांव में सदियों से नशामुक्त होली मनाने की परंपरा आज भी कायम है। जबकि होली में नशा सेवन की आम धारणा को बनगांव की पारंपरिक होली भी एक सामाजिक उदाहरण के रूप में है। वैसे बिहार में शराब पूर्णत: प्रतिबंधित होने के बाद भी कहीं न कहीं डोलते-हिलते लोगों को देखा जा सकता है।  होली त्यौहार के रोज स्वच्छ प्रतिस्पर्धा पूर्वक बनगांव की आबादी 2 भाग में बंट जाती है।  दोनों झुंड खुले बदन संपूर्ण गांव को अलग-अलग दिशा में घूमता है। गांव घुमने वाले हुजूम को लोग जैरह कहते है। जैरह संपूर्ण गांव को घूम कर बिषहरी स्थान पहुंचती है। इस बीच जगह-जगह गांव के घरों के झरोखे से मां-बहने रंग उड़ेलती है। विषहरी स्थान में मानव महल बना कर घुमौर का हुजूम शक्ति प्रदर्शन करता है। विषहरी स्थान में रंग-गुलाल के साथ होली संपन्न हो जाती है। बढती महंगाई और खत्म हो रही संस्कृति के इस दौर में संत लक्ष्मीनाथ गोसाई की कर्म स्थली बनगांव में घुमौर होली की परंपरा को अक्षुण्ण रखने की जरुरत है। होली के दिन वास्तव में हिन्दु व मुस्लिम का भेद नहीं रहता है।   
3 दिवसीय संगीत समारोह का आयोजन- 
होली में पहले एक सप्ताह पूर्व से ही शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत सहित पुबाय टोल में बबुआ बाल समाज के दरवाजा पर नटुआ नाच भी हुआ करता था। जबकि ललित झा बंगला पर वाराणसी के कलाकारों के द्वारा शास्त्रीय संगीत की रसधारा बहती रही है। लेकिन अब सप्ताह दिन में सिमट कर रह गया है। इस साल गोस्वामी लक्ष्मीनाथ होली समिति बनगांव के 3 दिवसीय समारोह का बनगांव के ग्रामीण सह रेल मंत्रालय,भारत सरकार के पूर्व निदेशक एवं नेशनल फर्टीलाईजर काॅरपोरशन के पूर्व निदेशक उदय शंकर झा उद्घाटन करेंगे।
बनगांव की होली में सजती थी शास्त्रीय संगीत की महफिल-
वर्ष 1952 के दशक से बनगांव में बनारस व दरभंगा घराने के शास्त्रीय संगीत के पुराेधाओं की महफिल होली में सजती रही है। बनगांव की होली समारोह में बनारसा घराने के प्रख्यात तबला वादक पं. सामता प्रसाद मिश्र उर्फ गोदई महाराज की भी प्रस्तुति हुई है। इस समारोह में पं. रघु झा, पं. सियाराम तिवारी, रामचतुर मल्लिक, अभय नारायण मल्लिक, प्रेम कुमार मल्लिक, राजन-साजन, गिरजा देवी, श्यामानंद सिंह, जयश्रीगुप्ता,  कैलाश महाराज, मिथिलेश कुमार झा, शारदा सिंहा जैसे प्रख्यात कलाकारों की प्रस्तुति होते रही है।      
वर्ष 2019 की कैसी होगी संगीत की महफिल-
इस साल होली को सुर, ताल व लय के साथ रंगीन बनाने के लिये बनारास के कलाकारों में डा. राम शंकर, स्वाति तिवारी, अंकिता कुमारी, ऋषव चतुर्वेदी, मोहित तिवारी गायन प्रस्तुत करेंगे। जबकि प्रीति सिंह कत्थक नृत्य के साथ तबला वादकों में पंकज राज, निर्मल यदुवंशी, ऋषव त्रिपाठी एवं पुष्कर कुमार हारमोनियम पर संगत के साथ-साथ सबों का एकल वादन भी होगा और शशांक गांगुली के बांसुरी की सुरीली आवाज से शास्त्रीय संगीत की महफिल सजेगी।  
19 मार्च से ही होली का आनंद उठाएंगे बनगांववासी-
बनगांव में किसी भी पर्व व त्योहार का निर्णय धर्मसभा के घोषणा के आधार पर होती है। धर्मसभा भी लक्ष्मीनाथ गोस्वामी के काल से चलते आ रही है। इस बार धर्मसभा में पारित निर्णय अनुसार 20 मार्च को होली पर्व होगी। जबकि बनगांव को छोड़ शहर सहित अन्यत्र क्षेत्रों में 21 मार्च को होना है। गोस्वामी लक्ष्मीनाथ होली समिति बनगांव के अध्यक्ष महावीर झा, सचिव शक्तिनाथ मिश्र एवं कोषाध्यक्ष भोलन खां के अनुसार होली की पूर्व स्थानीय दुर्गा स्थान परिसर स्थित होली मंच पर 19 मार्च की रात, विषहरी स्थान होली मंच पर 20 मार्च की रात एवं प्रमुख कार्यक्रम स्थल ललित झा बंगला पर 21 मार्च को शास्त्रीय संगीत समारोह का समागम होगा।


Sunday, November 5, 2017

लैंगिक हिंसा के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान पकड़ा जोर




लैंगिक हिंसा के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान पकड़ा जोर


 

प्रभात.पटना: भूमिका विहार, एनएसएस एवं श्रो अरविंद महिला कॉलेज के संयुक्त तत्वाधान मे कनाडा एम्बेसी के सहयोग से शुक्रवार 3 नवंबर को जेंडर सेल का गठन व लैंगिक हिंसा के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत श्रो अरविंद महिला कॉलेज पटना में भी किया गया। इस अवसर पर जेंडर सेल का गठन, जेंडर आधारित नुक्कड़ नाटक का मंचन, जेंडर आधारित रैम्प वॉक व जेंडर आधारित लोक गीत भी प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में कॉलेज के जेंडर यूथ स्पीकर्स एवं 200 से अधिक छात्राओं ने भाग लेकर जागरूकता की मुहर लगा दिया।

 इस मौके पर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित व प्रसिद्ध लेखक डॉ. शिवनारायण ने लिंग भेदभाव के नीव की आधार परिवार में ही बनती है। उन्होंने कहा कि आपके आचरण का ही नक़ल आपका संतान करता है और लिंग भेदभाव के आचरण से अपने बच्चों को आज बचने की जरुरत है। 
जबकि पदमश्री व लेखक उषा किरण खान ने कहा कि वर्तमान समय में हम समाज में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं कर सकते। यह पूर्व की कुप्रथा है जो कुछ लोग ढो रहे हैं। लैंगिक समानता हमारी सोच को दर्शाती है और ऐसा कहीं नहीं लिखा गया है कि महिलाओं के साथ हम भेदभाव करें। अब सरकार भी लगातार सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कार्य कर रही है। दहेज प्रथा व बाल विवाह के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। लैंगिक भेदभाव भी एक सामाजिक कुरीति है जिसे हमसबों को जड़ से मिटाना ही होगा।  
श्रो अरविंद महिला कॉलेज की प्राचार्य डॉ.पूनम चौधरी ने स्वागत भाषण में अपना विचार प्रकट करते हुए कहा कि जेंडर हमारे समाज की पुरानी मानसिकता का परिचायक है जहाँ स्त्री व पुरुष के अलग-अलग भूमिका बताई जाती है। लेकिन इस कॉलेज में ऐसी सोच की कोई जगह नहीं है और हम सभी को बराबरी की नजरों से ही देखती हूँ। कॉलेज के एनएसएस अधिकारी रीता सिंह ने एनएसएस द्वारा किए जा रहे कार्यो के बारे में जानकारी दी और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम मे आगे बढ़कर समाज मे सहयोग करने की बातें कही। कॉलेज मे लगातार पौधारोपन, रैली और खेलकुद जैसे कार्यक्रम की चर्चा करते हुए कही कि छात्राओं में शिक्षा के साथ सामाजिक जिम्मेवारी की भावना जगाना आवश्यक है और एनएसएस के कार्यक्रम इस दिशा में प्रमुख हथियार साबित हो रही है। इस मौके पर भूमिका विहार की निदेशक शिल्पी सिंह, एडवोकेसी इंचार्ज आशीष कुमार एवं माया शंकर ने भी अपने विचार प्रकट किये।


Tuesday, October 17, 2017

विश्व प्रसिद्ध संगीत कम्पनी मोक्ष म्यूजिक की अनुपम भेंट:एक प्रेमिका अपने प्रेमी की याद में गा रही है और कह रही है कि “मोरा पिया के बिना जिया लागे ना"।

दिल्ली में आयोजित की गई पिया के बिना लागे न जिया’ की शानदार स्क्रीनिंग

डॉ, हरिओम उत्तर प्रदेश के वही आईएएस ऑफिसर हैं जिन्होंने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर में अपने कार्यकाल के दौरान जेल में डाल दिया था और योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनते ही डॉ. हरिओम को कार्यभार से हटा दिया था। डॉ.हरिओम की जोड़ी इससे पहले भी कई गाने दे चुकी है जिनमे यारा वे, मजबूरियाँ, सोचा न था ज़िन्दगी आदि प्रमुख है...
मेघा वर्मा, दिल्ली: विश्व प्रसिद्ध संगीत कम्पनी मोक्ष म्यूजिक का मोस्ट अवैटेड गाना “पिया के बिना लागे न जियाविश्व स्तर पर 14 अक्टूबर को भव्य अनावरण किया गया। नई दिल्ली स्थित डॉलीवुड टैलेंट क्लब में शानदार रूप से आयोजित इस रिलीज़ इवेंट शो में चर्चित आईएएस ऑफिसर डॉ. हरिओम के द्वारा गाने को गाया गया। जिसमें “पिया के बिना लागे न जिया” की शानदार स्क्रीनिंग की गयी। इस मौके पर संगीतकार राज महाजन व गायक डॉ.हरिओम के साथ गाने की मुख्य अभिनेत्री अजिता झा भी प्रमुख रूप से मौजूद थीं। इस गाने के बारे में संगीतकार राज महाजन का कहना है कि यूथ को फोकस करते हुए इस गाने को बनाया है। डॉ.हरिओम ने इस गाने को तहेदिल से गाया है। वहीँ इस बारे में गाने के सिंगर डॉ.हरिओम ने कहा कि जब मैंने प्रथम दफा गाने की डमी को सुना तो ऐसा लगा कि मेरे लिए ही बना है। सही मायने में यह बहुत ही बेहतरीन गाना है। गाने का म्युज़िक एल्बम भी बहुत शानदार है। अजिता झा इसमें काबिल-ए-गौर अभिनय की है।
अपनी अनुभव के बारे में अभिनेत्री अजिता ने कहा वाकई में इस गाने पर काम करके बहुत ही अच्छा लगाएक चीज़ जो मुझे बहुत भायी वह थी इसकी थीमएक किस्म का फ्यूज़न है इस गाने मेंराज महाजन सर ने बहुत ही सूदिंग ट्रैक बनाया है। राज सर को मैं थैंक्यू बोलना चाहूँगी जिन्होंने मुझे इस गाने का हिस्सा बनायाआपको बता दें कि इस म्युज़िक एल्बम में राज महाजन एक नए फ्लेवर में नजर आये तो वहीँ हरिओम भी इस गाने में राज के साथ स्क्रीन शेयर करते दिखे। इसके साथ ही शुभम गुप्ता, मितुल कौशिक एवं ऋषभ शर्मा ने भी अपना-अपना काम बखूबी निभायापहली बार विश्व प्रसिद्ध संगीत कम्पनी मोक्ष म्यूजिक ने एक साथ दो और गानों की स्क्रीनिंग कीजहाँ ‘तेरी हर अदा’ की स्क्रीनिंग की गयी तो दूसरी तरफ वहीँ अपने आने वाले गाने “सोचा न था” की एक झलक दिखाईइस मौके पर सोचा न था का टीज़र रिलीज़ किया गयाबहुत जल्द ये गाना भी वैश्विक स्तर पर रिलीज़ किया जाएगातेरी हर अदा नवोदित सिंगर शुभम गुप्ता को राज महाजन की तरफ से दिया हुआ एक रिवॉर्ड हैशुभम की गायकी से अभिभूत होकर राज महाजन ने उन्हें ये मौका दियासोचा न था को अपनी आवाज़ से मन्दाकिनी बोरा ने सुन्दर बनाया हैडॉ, हरिओम उत्तर प्रदेश के वही आईएएस ऑफिसर हैं जिन्होंने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर में अपने कार्यकाल के दौरान जेल में डाल दिया था और योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनते ही डॉ. हरिओम को कार्यभार से हटा दिया थाडॉ.हरिओम की जोड़ी इससे पहले भी कई गाने दे चुकी है जिनमे यारा वे, मजबूरियाँ, सोचा न था ज़िन्दगी आदि प्रमुख है
मोक्ष म्यूजिक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के एडिटर चेतन चौधरी ने कहा है कि “मोरा पिया के बिना जिया लागे ना” बहुत ही प्यारा गीत है और इसे अपनी प्यारी और सुरीली आवाज में पोपुलर सिंगर व आईएएस ऑफिसर डॉ. हरिओम और सबके चहेते और जाने-माने सिंगर, एक्टर, म्यूजिक डायरेक्टर राज महाजन जी ने अपनी संगीत से जीवंतता प्रदान किया हैइस गाने को एक प्रेमिका अपने प्रेमी की याद में गा रही है और कह रही है कि “मोरा पिया के बिना जिया लागे ना"। उन्होंने यह भी कहा है कि यह गाना मेरे दिल के बहुत करीबी हैआशा है कि यह आप सबों के दिलों को भी छूएगा"बहुत लोकप्रिय प्रेम दुख की बात है" मोरा पिया के बिना जिया लागे ना "आपकी आत्मा को स्पर्श करेंगे” 



Tuesday, October 3, 2017

“दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकने के लिए जागरूकता अभियान

दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकने के लिए जागरूकता अभियान

मुखिया रामनाथ पांडे ने अपना उद्दगार व्यक्त करते हुए कहा कि दहेज प्रथा के कारण ही समाज मे बेटियों को जन्म से पहले ही कोख में ही खत्म कर दिया जाता है। लोग भगवान का दिया बेटियों जैसा अनमोल ऊपहार को भी लेने से इंकार कर देते हैं तो ऐसे लोगो को बुरे वक़्त मे भगवान भी मदद नहीं करता है...

कटिहार: दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकने के लिए गाँधी जयंती के अवसर पर सामाजिक संस्था भूमिका विहार कटिहार, की ओर से रामपुर गाँव में एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर रामपुर के मुखिया रामनाथ पांडे ने अपना उद्दगार व्यक्त करते हुए कहा कि दहेज प्रथा के कारण ही समाज मे बेटियों को जन्म से पहले ही कोख में ही खत्म कर दिया जाता है। लोग भगवान का दिया बेटियों जैसा अनमोल ऊपहार को भी लेने से इंकार कर देते हैं तो ऐसे लोगो को बुरे वक़्त मे भगवान भी मदद नहीं करता है। उन्होंने कहा कि बाल विवाह समाज के सम्पूर्ण विकास मे बाधक है। जब तक हम दहेज प्रथा एवं बाल विवाह जैसे बुराइयों पर विजय नहीं पाते हैं तब तक  हमारा समाज खुशहाल नहीं हो सकेगा।
भूमिका विहार के कार्यकर्ता हेमंत कुमार ने इस कार्यक्रम की अहमियतता को बताते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम के द्वारा समाज में विभिन्न समुदाय के लोगो के बीच जागरूकता लाकर ही दहेज प्रथा एवं बाल विवाह पर अंकुश लगाया जा सकता है। अभी दहेज़ प्रथा एवं बाल विवाह एक ज्वलंत मुद्दा है, जिस पर त्वरित कारवाई करना अत्यंत जरूरी है। दहेज प्रथा एवं बाल विवाह जैसे कुरीतियां कायम रही तो न जाने कितनी बेटियों को अपने प्राणों की आहुती देनी पड़ेगी। इस कुरीती से कितने परिवार की रौनक उजर चुकी है। इसके बावजूद यह समाज की ही नहीं इस देश की एक बड़ी समस्या बनी हुई है। दहेज विरोधी कई कानून बनाए जा चुके है, पर उनपर पूर्ण रूप से अमल नहीं होने से कई जगह तो इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोरा जाता है कि ज्यादा दहेज दिया या लिया वह अच्छे घराने से माना जाता है। ऐसे परंपरा को हम सबों को मिलकर तोड़ना होगा और इस कुरीतियों को समाज से पहले अपने मन व सोच से बाहर निकाल फेकना होगा।
भूमिका विहार के अन्य कार्यकर्ता ने भी एक स्वर से कहा कि आज हिंसा का आसान शिकार एक लड़की को ही होना पड़ता है। चाहे वह दहेज प्रथा हो या बाल विवाह। लड़कियों को जन्म के पहले से ही हिंसा की शिकार होना पड़ता है। इस सोच का जन्म परिवार में ही हो जाता है। इसलिए जब तक एक-एक परिवार की सोच नहीं बदलेगी तब तक समाज में जागरूकता नहीं आ सकती है। इस कार्यक्रम के माध्यम से दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकने के लिए जागरूकता संदेशहर परिवार मे जाएगी और साथ ही हमारे समाज मे भी एक अच्छा संदेश जाएगा।



बेटियों को कोख में मारने वालों के आँगन नहीं हो सकती ख़ुशी: बीबी नीलोफर

बेटियों को कोख में मारने वालों के आँगन नहीं हो सकती ख़ुशी: बीबी नीलोफर


जब तक एक-एक परिवार की सोच नहीं बदलेगी तो समाज में जागरूकता नहीं आ सकती है...

 उपेन्द्र यादव/अररिया: गाँधी जयंती के मौके अररिया के रामपुर पंचायत के कोडकतती गाँव में  सामाजिक संस्था भूमिका विहार के द्वारा दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकने के लिए जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस जागरूकता कार्यक्रम मे रामपुर पंचायत के मुखिया श्रीमती बीबी नीलोफर के आलावा भूमिका विहार के कार्यकर्ता विपिन कुमार सहित काफी संख्या मे ग्रामीण प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
रामपुर की मुखिया श्रीमती बीबी नीलोफर ने कहा कि इस दहेज प्रथा के चलते ही समाज मे बेटियों को कोख मे ही नहीं आने दिया जाता है। उसे जन्म से पहले कोख मे ही मार दिया जाता है। लोग भगवान का दिये उपहार को लेने से भी इंकार कर देते है तो ऐसे लोगो को बुरे वक़्त मे भगवान भी मदद नहीं करता। उन्होंने कहा कि बेटियों को कोख में मारने वालों के आँगन कभी भी ख़ुशी नहीं मिल सकती है। बाल विवाह समाज के सम्पूर्ण विकास मे बाधक है। जब तक हम दहेज प्रथा एवं बाल विवाह जैसे बुराइयों पर विजय नहीं पाते, हमारे समाज मे असली दशहरा की खुशी नहीं आएगी। इसलिए जब तक एक-एक परिवार की सोच नहीं बदलेगी तो समाज में जागरूकता नहीं आ सकती है। इस कार्यक्रम के माध्यम से दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकने के लिए जागरूकता संदेशहर परिवार मे जाएगी और साथ ही हमारे समाज मे भी एक अच्छा संदेश जाएगा।
इस मौके पर भूमिका विहार के विपिन कुमार ने कार्यक्रम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस आयोजन से समाज के विभिन्न समुदायों के बीच जागरूकता लाया जा सकता है। दहेज प्रथा एवं बाल विवाह एक ज्वलंत मुद्दा है, जिसपर त्वरित कारवाई करना अत्यंत जरूरी है।

न जाने इस दहेज प्रथा एवं बाल विवाह जैसे कुरीतियों मे कितने ही बेटियों की आहुतियां दी जा चुकी है और कितने परिवार की रौनक उजर चुकी है। दहेज विरोधी कई कानून होने के बाद भी पूर्ण रूप से अमल नहीं हो पाया है। कई जगह तो इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोरा जाता है, जो बिल्कुल गलत है।

Monday, August 28, 2017

पं. सुरेश झा की स्मृति में बॉलीबॉल प्रतियोगिता का आयोजन

 पं. सुरेश झा की स्मृति में बॉलीबॉल प्रतियोगिता का आयोजन
स्व. झा सहरसा को सहरसा शहर बनाने की दिशा में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है और पत्रकारिता के क्षेत्र में इंडियन नेशन जैसी अंग्रेजी आखबारों के संवाददाता के रूप में भी निष्पक्ष, निर्भिक व जनपक्षीय पत्रकारिता के जरोये जनसेवा कर ख्याति अर्जित करने की भी एक इतिहास रही है...

सहरसा। जिले के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के संस्थापक सदस्य सहित इंडियन नेशन के वारीय पत्रकार एवं कोशी क्षेत्र के महान विभूति पं. सुरेश झा की स्मृति में 29 अगस्त खेल दिवस के मौके पर बॉलीबॉल प्रतियोगिता का आयोजन 11 बजे दिन से मनोहर उच्च विद्यालय परिसर में होने जा रही है। इस बॉलीबॉल प्रतियोगिता के आयोजक भाजपा के युवा नेता शशि शेखर झा सम्राट ने तमाम खेल प्रेमी व आम शहरवासियों को प्रतियोगिता स्थल पहूंचकर आयोजक व खिलाड़ियों का हौंसला बढाने का सादर अनुरोध किया है।  
स्व. झा सहरसा को सहरसा शहर बनाने की दिशा में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है और पत्रकारिता के क्षेत्र में इंडियन नेशन जैसी अंग्रेजी आखबारों के संवाददाता के रूप में भी निष्पक्ष, निर्भिक व जनपक्षीय पत्रकारिता के जरोये जनसेवा कर ख्याति अर्जित करने की भी एक इतिहास रही है।
यह कहना गैर जरूरी है कि स्व. सुरेश झा मनोहर मध्य विधालय के संस्थापक प्रधानाध्यापक के साथ-साथ शहर अवस्थित मनोहर उच्च विधालय, सहरसा कालेज सहरसा वर्तमान में एमएलटी कालेज सहरसा, जिला स्कूल सहरसा, सहरसा गर्ल्स स्कूल एवं विधि महाविद्यालय सहरसा के बतौर संस्थापक सदस्य के रूप में न केवल विकास की सच्ची परिकल्पना को पूरा किया बल्कि शैक्षणिक जगत में इन संस्थानों को स्थापित करवाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान आज भी सराहनीय है। यह भी बतादें कि स्व. सुरेश झा भाजपा के युवा नेता भीआईपी रोड निवासी मणि झा के पुत्र शशिशेखर झा सम्राट के दादा जी हैं और भाजपा नेता श्री सम्राट अपने दादा स्व. सुरेश झा की स्मृति में खेल दिवस के अवसर पर आयोजन कर ऐसे सामाजिक व शैक्षणिक विद्वतजन के लिए एक नयी परम्परा की शुरूआत करने जा रहे हैं। परिवार के ऐसे सदस्य पर भी फक्र होनी चाहिए और समाज व परिवार के अन्य लोगों को भी अनुकरण करना चाहिए।



Friday, August 18, 2017

हमला चाहे जैसा हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा, नहीं उठेगा


हमला चाहे जैसा हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा, नहीं उठेगा

कष्ट चाहे जितनी हो, विचार हमारी नहीं मरेगी, आह हम नहीं भरेंगे...  
हां, चंदेश्वर ने उन शख्सियतों से इतना कुछ जरूर सीखा कि तहेदिल से कहता है कि आज भी गांधी, जयप्रकाश व बिनोबा के नाम पर कोई कार्यक्रम होता है तो अपने तनख्वाह से 500-1000 अधिक की राशि सहयोग करने की ताकत रखता हूं...
संजय सोनी/सहरसा: लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बिनोवा भावे, शिवराज ढढा, दादा धर्माधिकारी, ठाकुर दास बंग, आचार्य राममूर्ति शरीखे लोगों के खिदमतगार रहे चंदेश्वर आज भी वैचारिक रूप से जितना मजबूत है आर्थिक रूप से उतना ही कमजोर पड़ गया है। आप सबों को लगता होगा कि आखिर ये कौन है चंदेश्वर?
70 वर्षीय वृद्ध चंदेश्वर महतो राजधानी पटना के कदमकुंआ क्षेत्र के कांग्रेस मैदान अवस्थित “बिहार स्टेट गांधी स्मारक निधि” पटना के आर्डरली पद पर कार्यरत और गया जिले के अतरी थाना क्षेत्र के गांव शेवतर का रहने वाला है। संस्था की तरफ से आज भी तनख्वा के रूप में महज 3 हजार रूपये ही किसी तरह मिलता है। जब चंदेश्वर 1962 में संस्था ज्वाईन किया था तो उस वक्त भी मात्र 40 रूपये महीना ही पगार के तौर पर दिया जाता था। श्री चंदेश्वर संस्था में पेट भरने नहीं बल्कि परिवर्तन की वैचारिक क्रांति से अभिभूत होकर इस लालच में कि कम से कम लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बिनोवा भावे, शिवराज ढढा, दादा धर्माधिकारी, ठाकुर दास बंग, आचार्य राममूर्ति जैसे शख्सियतों से तो कुछ तो सीखने को मिलेगा। हां, चंदेश्वर ने उन शख्सियतों से इतना कुछ जरूर सीखा कि तहेदिल से कहता है कि आज भी गांधी, जयप्रकाश व बिनोबा के नाम पर कोई कार्यक्रम होता है तो अपने तनख्वाह से 500-1000 अधिक की राशि सहयोग करने की ताकत रखता हूं। उन्होंने एक जबर्दश्त बात यह कही कि मुझे अब तक समझ में नहीं आया कि आखिर सर्वोदय किसे कहते हैं। मेरी समझ में सर्वोदय कर मतलब सबों का उदय। लेकिन यहां तो सिर्फ व्यक्ति का ही उदय होता रहा है। उन्होंने कहा की आज भी सबों का एकसाथ उदय चाहने वाले व्यक्ति की जरुरत है। उन्होंने लोकनायक के साथ अपनी सेवा क्षण को याद करते हुए बोला कि जब जेपी सख्त बीमार थे तो मुझे शरीर दबाने का दायित्व सौंपा गया और बोला गया की जब गहरी नींद आ जाय तो छोड़ देना। लेकिन ऐसा मौका आते ही खुद कराह कर बोलते थे कि जरा इधर। जब उनकी इस कष्ट को मैने शरीर दबाकर महसूस किया तो औरों से कहा कि मुझे नदी में पानी डंगाने का काम मंजूर है पर, जेपी का कष्ट देखना मंजूर नहीं है। उनकी व्यथा देखकर मुझे लगा कि ईश्वर को इन्हें अब धरती पर नहीं रखना चाहिए। लेकिन सत्तालोपियों का कुनबा सिर्फ यही चाहते रहे कि जेपी बीमार हालत में भी रहे तो मेरा काम बन जाएगा। कहने का मतलब श्री चंदेश्वर ने स्पष्ट कहा कि जेपी के विचारों का सौदा करने वाले उस वक्त भी थे और आज भी है। तो भला इस गांधी स्मार निधि व उसके कर्मचारियों को कौन देखने वाला है।   

वे यह भी बोलते हैं कि 1974 के आंदोलन में “बिहार स्टेट गांधी स्मारक निधि” छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का मुख्य केन्द्र रहा है और यहां उन सबों के आलावा अमरनाथ भाई, कर्पूरी ठाकुर, नीतीश कुमार, लालू यादव, रामबलिास पासवान, सुशील कुमार मोदी, बिनोदा नंद झा, शिवानंद तिवारी जैसे लोगों का यह संस्था एक तरह से प्रशिक्षण केन्द्र रहा है। फिर भी इस संस्थान की खराब हालत पर कोई ध्यान नहीं देता है। उन्होंने कहा कि इमेरजेंसी में इस संस्थान में पंछी तक रहना पसंद नहीं करता था तो भी चंदेश्वर ही रहा करता था। श्री चंदेश्वर ने बोला कि “हमला चाहे जैसा हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा, नहीं उठेगा और अब भी कष्ट चाहे जितनी हो, विचार हमारी नहीं मरेगी, आह हम नहीं भरेंगे...। तो आज भी हम उसी मूलमंत्र को आत्मसात कर गांधी स्मारक निधि में सेवारत हैं।